छाया (मराठी कहानी)
नीलकंठ नांदुरकर अपनी ही लिखी कहानी की अंतिम पंक्तियाँ—‘और वह शून्य में नजरें लगाए खिड़की से बाहर देखती रही।’ वैसे ही छाया खिड़की से बाहर दे...
छाया (मराठी कहानी)
नीलकंठ नांदुरकर अपनी ही लिखी कहानी की अंतिम पंक्तियाँ—‘और वह शून्य में नजरें लगाए खिड़की से बाहर देखती रही।’ वैसे ही छाया खिड़की से बाहर दे...
कहानी: तलाश
रीता जी एक बैंक में कैशियर के पद पर कार्यरत थीं। पति एक मल्टीनेशनल कंपनी में जनरल मैनेजर और दो बच्चे – बेटा बीटेक के फाइनल ईयर में, बेटी एमब...
छला समर्पण (एक सच्ची कहानी)
यह कहानी खुली छोड़ दी गई है, ताकि पाठक सोच सके — क्या कभी छोटे भाई, माता- पिता और बहनें उस त्याग को समझेंगे? या यह भी एक ऐसी कहानी होगी, जो ...
कहानी : अमर प्रेम
- डॉ रवीन्द्र प्रभात नौकरी छोड़ने के बाद मैं गाँव आ गया। वहां के एक स्थानीय अखबार में कॉलम लिखने लगा। मेरा कॉलम काफी चर्चित हुआ और मेरी इच्छ...