आज 10अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय पुस्तक मेले के सभागार में माधवी फाउंडेशन लखनऊ और विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट आगरा के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परम्परा में पर्यावरण बोध विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। समारोह के अध्यक्ष डॉ. योगेश गुप्त थे और मुख्य अतिथि डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव थे। सारस्वत अतिथि श्री मुकेश कुमार, डॉ. अखिलेश निगम अखिल, डॉ. रवीन्द्र प्रभात थे।

मुख्य वक्ता डॉ. मीनू खरे और डॉ. अलका प्रमोद थी।

माधवी फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. मिथिलेश दीक्षित और विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. मोहन मुरारी शर्मा ने संगोष्ठी के प्रयोजन और आयोजन पर प्रकाश डाला तथा पर्यावरण तथा साहित्य के क्षेत्र के विद्वानों को सम्मानित किया।

सम्मान प्राप्त करने वाले विद्वानों में डॉ. योगेश गुप्त, श्रीमती मंजू सक्सेना, श्री कैलाश बाजपेयी,   डॉ. हरिलाल मिलन, डॉ. मीनू खरे, सुश्री निवेदिता जी, सुश्री वर्षा अग्रवाल, श्रीमती अंजू निगम, 

श्री विनय श्रीवास्तव, डॉ. हरिश्चन्द्र शाक्य, डॉ. अनिता कपूर, डॉ. रश्मि शील आदि थे। संचालन डॉ. रश्मि शील ने किया।

डॉ. मिथिलेश दीक्षित की पुस्तक मेरे साक्षात्कार का. वर्षा अग्रवाल की पुस्तक आचमन का लोकार्पण भी इस अवसर पर किया गया।

समारोह में विभन्न विद्वानों ने सम्बन्धित विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये। मीनू खरे ने बताया -भारतीय ज्ञान परंपरा में नदी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और प्रकृति की जीवंत धारा मानी गई है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु सहित अनेक नदियों का स्मरण और स्तवन हमें बताता है कि हमारे पूर्वज नदियों को पहचानते, उनका सम्मान करते और उनके स्वाभाविक प्रवाह को जीवन का आधार मानते थे। नदी को माता और जीवनदायिनी मानने का अर्थ केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी है। नदी का अपना प्रवाह क्षेत्र, अपना तट और अपना विस्तार होता है; मनुष्य यदि उसके प्राकृतिक क्षेत्र पर अतिक्रमण करता है, तो वर्षा और बाढ़ के समय नदी उसी भूभाग में पुनः फैलती है। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि नदी अपनी भूमि किसी से छीनती नहीं, बल्कि जब हम उसकी भूमि पर अधिकार कर लेते हैं तो वह समय आने पर अपनी भूमि वापस ले लेती है। भारतीय ज्ञान परंपरा का यह पर्यावरण-बोध हमें सिखाता है कि नदी पर अधिकार नहीं, नदी के साथ सह-अस्तित्व ही सभ्यता का वास्तविक मार्ग है।


अलका प्रमोद ने कहा --सनातन भारतीय धर्म में प्रकृति को देवतुल्य स्थान प्रदान किया गया है जिसमें प्रकृति के पालन-पोषण एवं संरक्षण को जीवन के आचरण में विलय कर लिया गया है।

आदि काल से ऋग्वेद में वन को देवी कहा गया है तो वैदिक ग्रंथों में ‘वनानां पतये नमः’  एवं  ‘नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः’ कहा गया है। अथर्वेद में भी वनस्पति को समस्त प्राणियों का पोषक माना गया है। यजुर्वेद में पेड़-पौधों को देवता ही मान लिया गया है वैदिक ग्रन्थों में वृक्षादि को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण वनसम्पदा, वनस्पति जगत, वृक्षों व उनके संरक्षकों और पालकों को भी वन्दनीय एवं पूजनीय कहा गया है- 

‘‘नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो वनानां पतये नमः

वृक्षायो पतये नमः औषधीनां पतये नमः

वृक्षायां पतये नमः अरण्यानां पतये नमः।’’

डॉ. वीरेन्द्र यादव जी ने विस्तृत रूप से प्रकाश डाला --भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और चेतना का आधार है।

वेदों से लेकर उपनिषदों तक पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के प्रति श्रद्धा और संरक्षण का संदेश मिलता है।

हमारी संस्कृति ने प्रकृति को माता और समस्त जीव-जगत को एक विराट परिवार के रूप में देखा है।

नदियों, पर्वतों, वनों और वृक्षों के प्रति आस्था हमारी पर्यावरण-संवेदनशील जीवन-दृष्टि का प्रमाण है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे आत्मीय संबंध को अभिव्यक्त करती है।

भारतीय चिंतन विकास और प्रकृति के बीच संतुलन को ही वास्तविक समृद्धि का आधार मानता है।

आज जब पृथ्वी पर पर्यावरण का संकट का बढ़ता जा रहा है।हमारी पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के संकट से जूझ रही है, तब हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा एक नई दिशा दिखाती है।श्री मुकेश कुमार ने भी अपने वक्तव्य में पर्यावरण पर प्रकाश डाला। 

डॉ रवीन्द्र प्रभात ने बताया ---भारतीय ज्ञान परम्परा में नदियों, पर्वतों, वृक्षों और वनस्पतियों के प्रति श्रद्धा का भाव भी पर्यावरणीय चेतना का महत्वपूर्ण आधार है। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा जैसी नदियों को मातृस्वरूप मानना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जल-स्रोतों के संरक्षण की सांस्कृतिक व्यवस्था भी थी। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी आदि वृक्षों के प्रति सम्मान ने समाज में वृक्ष संरक्षण की भावना को मजबूत किया। प्रकृति की रक्षा वास्तव में मानव सभ्यता और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा है।कार्यक्रम के अध्यक्ष ने अनेक मूल बिन्दु प्रस्तुत करते हुए कहा --भारत की सांस्कृतिक संरचना मूलतः प्रकृति-सापेक्ष रही है। भारतीय जीवन-दर्शन में पृथ्वी को माता, नदियों को जीवनदायिनी, वृक्षों को पूजनीय तथा सूर्य को ऊर्जा और जीवन का स्रोत मानने की दीर्घ परंपरा मिलती है।

'पर्यावरण' शब्द सामान्यतः उन प्राकृतिक, जैविक और सामाजिक परिस्थितियों के समुच्चय को व्यक्त करता है जिनके भीतर जीवों का जीवन विकसित होता है।  पर्यावरण-बोध से आशय प्रकृति, जीव-जगत और मानव-समाज के परस्पर सम्बन्ध की ऐसी समझ से है जो मनुष्य के आचरण को प्रभावित करे।

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