कहानी
() धनराज शम्भु
रेखांकन: माधव जोशी 
1.
1835 मॆ गोरे मालिक का दलाल किसुना भारत के उत्तर प्रदेश के छपरा गाँव में आया और चिल्ला – चिल्लाकर कहने लगा “छपरा वासियो ,यदि तुम लोग रातों-रात अमीर बनना चाहते हो और सुखी जीवन बिताना चाहते हो तो मेरे साथ चलो।“

पर कहाँ चलें भैया........? आप कौन हैं ? भीड़ में से जुगुल महतों ने उसे रोकते हुए कहा।

देखो भैया मालिकों को ठगकर ,तुम्हारी सहायता के लिए यहाँ आया हूँ । यदि मेरे साथ चलोगे तो ज़िंदगी बन जाएगी। मैं किसुना हूँ , सात समुंदर पार से मारीच देश से आया हूँ। देश क्या, मानो स्वर्ग से आया हूँ।

अन्य कई लोगों की करह जुगुल महतों के मस्तिष्क में प्रलोभन ने घर करना प्रारम्भ कर दिया। रात्रि में सुखिया और दोनों बच्चों के सो जाने के बाद जुगुल किसुना के बताए पते पर चलने लगा। वहाँ पहुँचकर मारीच जाने केलिए नाम देने लगा। उसे दिन समय और दिनांक बता दी गई।जुगुल उस दिन से स्वप्नों का पुल बाँधने लगा। वह किसी से कुछ बोलता नहीं था , घरवालों से तो और भी छिपाकर रखता था । उसे पता था कि यदि घर के सदस्यों को इस बात की भनक मिलेगी तो वे बौखला उठेंगे। उसका मारीच देश जाना रूक जाएगा। चुपके- चुपके उसने सारी तैयारी कर ली। जिस दिन उसे घर से निकलना था ,उसे बहुत दुख हो रहा था । मानो कलेजा मुँह को आ रहा था क्योंकि वह अपने कलेजे के टुकड़ों को छोड़कर जा रहा था। एक ऐसी अनजान जगह पर जहाँ के बारे में कुछ भी खबर न थी। केवल इतना याद था कि उस देश में यदि पत्थर उलाटेंगे तो सोने मिलेंगे। किसी भी तरह छत्तीस भारतीयों को फुस्लाकर कलकता के बन्दरगाह पर लाया गया और (आतलास) जहाज़ पर चढ़ा दिया गया। सभी जहाजी भाइयोंने अपनी मातृभूमि भारत को प्रणाम किया। उन्हें कहाँ पता था कि यह प्रणाम उन लोगों का अंतिम प्रणाम होगा। सभी की आँखें आँसू से डबडबा गए थे । चप्पी साधे तंगी जगह पर बैठे कल्पना लोक में जा रहे थे। मन से बस यही पँक्ति गुनगुना रहे थे 
( कलकता से छुटल जहाज़ साँवरिया धीरे चलो )

जितने अच्छे वादे किए गए थे सभी का उलंघन जहाज़ में चढ़ते ही होने लगा। पशुओं की तरह छोटी सी जगह में ठूँस दिया गया। कई सप्ताहों की यात्रा के बाद बीमार और कमज़ोरी अवस्था में (पोर्ट-लुई ) के बंदरगाह तक पहुँच पाए। एक नई सरज़मीन देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ –कि इस जंगल में तो पत्थर नज़र ही नहीं आ रहे हैं।----- फिर सोना..

2.
तरह-तरह के विचार दिमाग में आने लगे। उनके हृदय में दुख का सागर टूट पड़ा । अब उन्हें अपने घर-परिवार की याद आने लगी। मन तो चाहता था कि ज़ोर से रोएँ ,मगर अपनी करूणा को अपने अंदर ही दबाकर रखना पड़ा। गोरे मालिकों के गम्भीर और भद्दी गालिययों से मिश्रित स्वर में ढकेलते हुए नीचे उतरने का संकेत दे रहे थे। जुगुल ओर उनके मित्रों को समझ में नहीं आ रहा था कि गोरे लोग क्या कह रहे हैं। ( दे साँदे बान वीलें मालबॉर) केवल इतना समझ में आया कि उतरो-उतरो बाकी फ्रेंच और कृओल के शब्द समझ में नहीं आए। दलाल बता रहा था कि यह कुलीघाट है। यही मारीच देश की राजधानी है। उतरो और इन चौदह सोपानों को चढ़कर लंगार पर ठहरो। जहाज़ी भाइयों को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कर रहे हैं और क्या होने वाला है।
कुछ ही घड़ी में किसुना गोरे मालिक के साथ आया । जुगुल और उनके मित्रों ने प्रथम वार गोरे आदमी को देखा । उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। किसुना ने कहा कि सभी लोगों को उस छोटे से तालाब में नहाना होगा।

चलो एक –एक करके नहाओ।-- कितनों को लाज आ रही थी ,कितनों को चिंता हो रही थी कि नहाने के बाद वे क्या पहनेंगे। फिरभी किसी भी तरह उनको नहाना ही पड़ा।एक –दो दिन केलिए उनको वहीं पर बैठा दिया गया। तीसरे दिन कितने ही कोठी के गोरे मालिक वहाँ पधारे। उन्होंने दाम लगाना शुरू किया ।पहले मज़बूत और तगड़े लोगों को चुना गया। --मैं उस मोटे-टगड़े को लूँगा, ---मैं उस लम्बे पच्छते मर्द को लूँगा –लोत ला गॉद सा पूर म्वा । मेरे लिए रखो। --मेरे लिए इन पाँचों को रखो। इस तरह ऊँची –नीची कीमतों में सारे कुलियों को खरीद लिया गया। उन में कुछ ने महिलाओं को भी ले लिया। कोठी के मालिकों ने सभी को तितर बितर कर दिया। सभी अपने लोगों से अलग होकर छितरा गए। जुगुल महतों जहाँ गया वहीं पर सुरीली और दो महिलाएँ भी गईं। सभी लोग दूसरे ही दिन से जंगल साफ़ करने के काम में लग गए। सुरीली रुखी –सुखी जो भी मिलती तैयार कर के खिलाती। बस भूख मिटाने की ज़रूरत थी , स्वाद का तो उन्हें पता भी नहीं था। केवल भूख दब जाए तो सम्झो बेड़ा पार हो गया।

सुरीली के दुख और अच्छे स्वभाव को देखकर जुगुल महतों ने सुरीली को पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहा। सुरीली ने भी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वीकार कर लिया । कठिन स्थिति में भी उन्हों ने अपनी गृहस्थी निभाने का प्रयास किया। उनके दो बेटे भी हुए ,विनोद और रोहित । बच्चे हो भी गए तो भी उन को काम से छुटकारा नहीं मिला। अबतो उनको और भी कठोर परिश्रम करना पड़ता क्योंकि अब उनपर दो बच्चों

3. 

पाँच-पाँच सालों के बाद रोहित और विनोद को भी कभी मालिक के घर तो कभी आँगन में या खेतों में काम करना पड़ता था। पढ़ने का प्रावधान इन बच्चों के लिए नहीं था। पढ़ाई तो केवल गोरे मालिक के बच्चे ही कर सकते थे।

एक सुबह पाँच बज गए लेकिन जुगुल महतों अभी तक खाट पर ही पड़ा था। सुरीली को शंका हुई कहीं अस्वस्थ तो नहीं पड़ गए। देखने के उद्देश्य से अभी मुड़ी ही थी कि बाहर से आवाज़ आई – जुगुल अरे ओ जुहगुलवा --- कहाँ मर गया । कहा नहीं था कि कर्बला नदी के पास कल चार बजे आ जाना । कान में भूसा भरा है क्या ?”

“ बीमार हो गए हैं किसुना साहेब,नहीं तो ये इस समय तक घर पर रहते ही कहाँ हैं। “ भयभीत स्वर में सुरीली बोलती हुई जा रही थी।

“ बीमार है , नहीं जानते हमारे काम में बीमार होना मना है। चलो मेरे साथ --- बीमार है , कामचोर कहीं का। “ खींचकर खेतों की ओर ले जाता है। एक सुनसान जगह पर अकेले काम करने केलिए डाल देता है। बेचारा जुगुल बीमारी की हालत में थोड़ा काम करता है पर कमजोरी के कारण वही पर लुढ़क जाता है। ---पानी पानी की रट लगाता है कि कोई उसे दो घूँट पानी पिला दे । ऐसा हो न सका ,किसी को पता ही न था कि जुगुल कहाँ है ।

यदि किसी को पता था तो वह केवल किसुना सरदार था । दो –तीन घंटे बाद जब सरदार वहाँ गया तो उसने देखा कि जुगुल ज़मीन पर पड़ा हुआ है , देखने का प्रयत्न करने लगा कि साँसें चल रही है कि नहीं। सौभाग्य से वह ज़िदा था । उसे घर लाया गया। सुरीली भी घर आ गई । बनस्पति पदार्थ से जो भी औषधि बनाने जानती थी ,तैयार करके देने लगी। सरदार ने पहले ही कह दिया कि जुगुलवा ने पूरा काम नहीं किया है ,अतः उसका डबल कट होगा। यानी दो दिनों के पैसे काट लिए जाएँगे। सुरीली सोच रही थी कि पैसे का क्या होगा बस उसका पति स्वस्थ हो जाए , यही सबसे बड़ी बात है। आदमी जो सोचता है वह होता तो नहीं। भगवान की इच्छा के आगे किसी का बस चलता ही नहीं। जुगुल कमज़ोर होता चला गया । उसने विनोद और रोहित को अपने पास बुलाया। उसने बड़ी ही गम्भीर स्वर में धीरे-धीरे कहा – “ मैं शायद अब नहीं बचूँगा, तुम लोग अभी युवा बनोगे ,मारीच देश का बागडोर सम्भालोगे। इस धरती माँ और अपनी माँ की रक्षा करना। यहाँ की हवा,पानी , हर चीज़ को बचाकर रखना तुम लोगों का परम धर्म है। दोनों बच्चों से वादा करवा लेने के बाद ,सुरीली को भी बुलाकर समझाया – सुरीली मेरे पास वक्त बहुत कम है। और अब मैं कोई काम करने की हालत में भी नहीँ इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम इन दोनों बच्चों को देखो। मैं जानता हूँ कि परिस्थिति गम्भीर है फिरभी जो भी तुम से हो पाएगा इन लोगों केलिए करना। हिम्मत कभी न हारना ,मैं जहाँ भी रहूँगा तुम्हारे आस-पास साहस बढ़ाता रहूँगा। “

“ कैसी बातें कर रहे हैं – आप को कुछ नहीं होगा। व्यर्थ में अपने –आप को मत थकाएँ। “

दोनों एक-दूसरे को सांत्वना देने का प्रयत्न कर रहे थे। दोनों को पता था कि अब दोनों का साथ कुछ ही दिनों का रह गया है। जुगुल अकेले में सोचता रहता , उसे सुखिया की याद आता , छपरा के दोनों बच्चों की याद आती । उसे लग रहा था कि उसने एक बड़ा अपराध किया है। पता नहीं वे लोग किस हाल में जी रहे होंगे। सोचा था कि बहुत सारे सोना कमाकर लेजाएगा और उनका दामन खुशियों से भर देगा। सोची हुई बात ऐसी ही रह गई । जीवन इस मोड़ पर आ गया कि पछतावे के सिवा और कुछ नहीं रह गया है। बस इतनी ही आशा बची है कि विनोद और

4.

रोहित भविष्य का निर्माण कर पाएँगे । उसने सुरीली से भी अपनी पिछली बातें बता दी थी। उसपर कोई खास
असर नहीं हुआ था क्योंकि भले ही वह शादीशुदा न थी फिरभी यहाँ की परिस्थिति ने जुगुल के रूप में उसे सच्चा जीवन साथी मिल गया।

बीमारी के बावजूद भी दूसरे दिन उसे फिर से खेत में लेजाया गया । पता नहीं उससे क्या करवाया गया कि जुगुलवा की लाश ही घर आई। बाद में पता चला कि कमज़ोरी में काम न कर पाने के कारण उसे पेड़ से बाँधकर गन्ने के रस चुवा दिया गया था ताकि मधुमक्खियाँ डंक मार-मारकर चूसे और जुगुल को परेशान करे। पति की ऐसी मौत के बारे में जानकारी प्राप्त कर सुरीली ने तय कर लिया था कि विनोद और रोहित को ऐसा बनाएगी कि एक दिन गोरे मलिक का तख्ता पलट देंगे। एक दिन यह देश सभी कामगरों का देश बन जाएगा । उन्हीं दिनों गांधी जी का आगमन हुआ । दोनों लड़के ही क्या सारे लोग प्रभावित हुए । दोनों ही ने अपने पिता के प्रति अन्याय को देखा था । उन के दिमाग में सारी बातें तरोताज़ा थीं। उन्होंने प्रण कर लिय़ा कि –जबतक इस टापू को अपना न बना लेंगे चैन की साँस नहीं लेंगे।


लेखक मॉरीशस से कवि, साहित्यकार और अध्यापक हैं। 1977 में प्रशिक्षण महाविद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त कर हिंदी अध्यापक बने और अब तक हिंदी अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। इनकी  रचनाएं: 1976 में "तरंगिनी" कविताएं, 1996 में "एहसास" कविताओं और गज़लों का संग्रह अन्य पत्र-पत्रिकाओं , अखबरों आदि में रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं जिन में बसंत, आक्रोश, पंकज , रिमझिम, प्रभात आदि प्रमुख हैं। वर्तमान में ये मॉरीशस के हिन्दी प्रचारणी सभा में मंत्री हैं।

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