विश्व हिन्दी दिवस समारोह की अध्यक्षडॉ. मिथिलेश दीक्षित और संयोजक -संचालक डॉ. सुषमा सिंह


लखनऊ। हाइकु गंगा में 10 जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस ‘पर बही हाइकु की धारा ,जिसको प्रवाह दिया हमारी तारनहार दीदी डॉ.मिथिलेश दीक्षित ने,जिन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिन्दी की वैज्ञानिकता,विशेषता,उपयोगिता और वैश्विकता पर विस्तार से प्रकाश डाला और बताया कि संख्या, स्तरीयता,साहित्य और प्रमुख बोली के रूप में तो इसका प्रमुख स्थान है ही,इसकी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक लिपि देवनागरी लिपि है । 

हाइकु के विषय में आपने कहा कि हिन्दी की सहस स्वाभाविक लोच ने हाइकु को कवित्व की गरिमा प्रदान की और वर्णिक और मात्रिक ,दोनों रूपों में यह हमारी भाषा की एक प्रमुख विधा बन गयी। नीना जी ने हिन्दी का मुक्त कंठ से गौरव गान किया। सुनीता दीक्षित जी ने हिन्दी को भारतीय संस्कृति का सार बताया। साधना वैद जी ने हिन्दी को ब्रह्माण्ड की सबसे प्रभावी और विश्व स्तर पर चौथी लोकप्रिय भाषा बताया ।साथ ही उसके व्याकरण और रस ,छन्द,अलंकार आदि का भी उल्लेख किया। पुष्पा सिंघी ने बताया कि संस्कृत की सुता हिन्दी में युगचेतना की प्रखर अभिव्यक्ति मिलती है ।अनीता कपूर ने हिन्दी की संवेदनशीलता की सराहना की,जिसके कारण प्रवास में भी प्रगाढ़ रिश्ते बन जाते हैं। 

रुबी दास ने हिन्दी में समाहित ज्ञान की सराहना की और उसे देश की पहचान बताया। डॉ.आनन्द प्रकाश जी ने हिन्दी को अपनी अस्मिता,अपनी पहचान,अपना स्वाभिमान कहा और हिन्दी के बिना राष्ट्र को गूँगा बताया। वर्षा अग्रवाल ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कटिबद्ध होने का आह्वान किया और हिन्दी दिवस (14 सितम्बर)मनाने को देश की विडंबना बताया ।सुषमा सिंह ने बताया कि विदेश में हिन्दी अमोघ शस्त्र का काम करती है और हमारी बारहखडी पूर्णतया वैज्ञानिक है। कल्पना दुबे ने बताया कि हिन्दी के बटुए में विश्व का बड़ा बाज़ार समाया हुआ है ।परदेश में हिन्दी हमें जोड़ती है किन्तु भाषा विवाद हिन्दी की गरिमा में ग्रहण जैसा है।

वन्दना सहाय जी ने कहा कि हिन्दी में हमारी विरासत को सहेजने की क्षमता है। वह कई बोलियों की जननी है और राष्ट्रीय एकता की वाहक भी है। लवलेश दत्त जी ने बताया कि भारतीयों के लिए हिन्दी ही चिन्तन,मनन और जीवन का आधार है और इसकी विशेषता है कि आधे वर्ण को पूरा वर्ण सहारा देता है ।आपने भारतीयों की मानसिक ग़ुलामी पर भी कटाक्ष किया कि हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ भी वे अंग्रेज़ी में ही देते हैं-“हैप्पी हिन्दी डे!” इंदिरा किसलय जी ने 14सितम्बर को मनाये जाने वाले हिन्दी दिवस को ढोंग बताया,ग़ुलामी के जीवाश्म का प्रमाण बताया। डॉ.मिथिलेश दीक्षित ने हिन्दी को पावन कहते हुए राष्ट्रीय अस्मिता की सौभाग्य बिन्दी कहा ।कंचन अपराजिता ने माँ की लोरी में ही हिन्दी का सार पा लिया । 

रवीन्द्र प्रभात ने हिन्दी को प्रणाम्य माना,भारत का गहना माना और जन-जन की भाषा कहा।अंजू निगम जी ने हिन्दी भाषी व्यक्ति को ककहरा के सहीं ज्ञान की बढिया चुनौती दी है ।हम भी आपकी इस कामना में आपके साथ हैं कि भारत में हिन्दी की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। सुकेश शर्मा जी को हिन्दी वंशी की धुन सी सुखद और मनमोहनी लगती है। सावी जी को हिन्दी का माधुर्य लुभाता है । 

सरस दरबारी जी को हिन्दी की लोकप्रियता का राज उसकी सहजता में मिला है।ऋता जी को लगता है कि हिन्दी प्रवासी भारतीयों की जान है और प्रान्तीय एकता में हिन्दी का बहुत बड़ा योगदान है ।कैलाश बाजपेयी जी ने भी हिन्दी को उत्तर-दक्षिण का भाषा-सेतु माना है। अजय चरनम जी का कहना है कि विभिन्न बोलियों के साथ हिन्दी को कैसे भी बोलें,मीठी लगती है ।समापन के समय भी अपने वक्तव्य में समारोह की अध्यक्ष डॉ,दीक्षित ने कहा बताया कि 150 से अधिक देशों में हिन्दी में लेखन और प्रकाशन प्रमुखता से हो रहा है,अनुवाद भी हो रहे हैं,जिनके माध्यम से हमारी सांस्कृतिक-साहित्यिक सम्पदा विश्व भर को प्रभावित कर रही है ।आपने आज के समारोह में भाग लेने वाले हाइकुकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए उन्हें बधाई दी ।तदर्थ हम सब उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं ।

संचालन और रिपोर्टिंग 

डॉ.सुषमा सिंह 

पूर्व प्राचार्य-आर.बी,एस.कालेज, आगरा ।

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