धारावाहिक


हमारे मनीषी साहित्यकार 

हम जैसे जैसे आधुनिकता की चकाचौंध में खोते जा रहे हैं, वैसे वैसे अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत से विमुख होते जा रहे हैं. हमारे प्राचीन  साहित्यिक मनीषियों ने अपनी अनमोल कृतियों द्वारा विश्व स्तरीय साहित्य का विपुल भंडार विरासत के रूप में हमें दिया है, जो सिर्फ हम भारतवासियों के लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिए धरोहर है. इतना तो हम सभी जानते  हैं कि सनातन धर्म की तरह संस्कृत भाषा भी पूरी दुनिया की प्राचीनतम भाषा है. संभवतः इसलिए ही इस भाषा को देवभाषा कहा गया है. यानि देवताओं की भाषा संस्कृत ही थी. चारों वेदों के साथ साथ हमारहमारी जितनी भी धार्मिक पुस्तकें तथा प्राचीन साहित्य हैं वे सभी संस्कृत भाषा में ही लिखी गयी हैं. बाद में (बौद्धकाल में) पाली भाषा का उदय हुआ. हमारे देश में एक से बढ़कर एक साहित्यिक मनीषी हो चुके हैं, जिनकी विश्वविख्यात कृतियों पर हमें अभिमान है. उन्हीं साहित्यिक मनीषियों में से एक थे महाकवि कालिदास. कालिदास जी के बचपन के कई नाम थे, जैसे कृष्ण मुख, कुमार श्याम तथा नीलकंदन. लेकिन वे नीलकंदन नाम से अधिक विख्यात थे. इसलिए इस आलेख में मैं तब तक उन्हें नीलकंदन नाम से ही सम्बोधित करूँगा, जब तक कि वे कालिदास नहीं बन जाते.

उनका जन्म कब और कहॉं हुआ था, इस पर विद्वानों के विचारों में काफी विरोधाभास है. कुछ विद्वानों तथा इतिहासकारों का अभिमत है कि उनका जन्म ईसापूर्व 100 वीं शताब्दी में उज्जैन नगर के किसी गाँव में तब हुआ था जब भारत के शासक विक्रमादित्य थे. इसकी पुष्टि के लिए विद्वतजन महाकवि कालिदास की प्रथम नाट्यकृति मालविकाग्निमित्रम् का उदाहरण देते हैं. इस नाटक के नायक राजा अग्नि मित्र हैं, जो 170 ईसा पूर्व में उज्जैन के राजा थे. इनके पुत्र राजा वसुमित्र ने सिंधु नदी के तट पर यवनों के नेता मिलेंडर (बौद्ध साहित्य में मिलिंद) को पराजित कर यवनों को भारत से खदेड़ दिया था. इससे पूर्व भारत में मौर्य राजवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी यूनान के बादशाह सिकंदर को भारत से निकाल बाहर किया था. उन दिनों मगध के अंतिम राजा शुंग राजवंश के देवभूति थे. परंतु इससे इस बात की पुष्टि नहीं होती कि कालिदास का जन्म उसी काल में हुआ था. एक तथ्य और विचारणीय है कि उस समय तक यदि मगध (भारत) पर शुंग राजवंश का शासन था, तब विक्रमादित्य कहाँ से आ गये.? हो सकता है महाकवि ने अपनी प्रथम नाट्य कृति मालविकाग्निमित्रम् की रचना चौथी/पांचवीं शताब्दी में ही की हो. इसकी पुष्टि छठी शताब्दी के सुप्रसिद्ध कवि बाणभट्ट की विश्वविख्यात कृति "हर्षचरित" से होती है. हर्षचरित में राजा हर्ष की विजय गाथा है. इसके अनुसार महाकवि कालिदास चौथी/पांचवीं 

शताब्दी के प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय, जिन्होंने विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की थी, के दरबारी कवि, यानि उनके दरबार के नवरत्नों में से एक थे. इनकी राजधानी पाटलिपुत्र (पटना) थी, जो बाद में उज्जैन चली गयी. कालिदास का जन्म उज्जैन के ही एक गाँव में निर्धन ब्राह्मण के घर में हुआ था. जब वे बालावस्था में ही थे, तभी उनके माता पिता का देहांत हो गया. उनका लालन पालन एक यादव दम्पति ने किया. एक अन्य विद्वान के अनुसार उनका जन्म उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित कविल्ठा नामक ग्राम में हुआ था. जबकि कुछ विद्वानों का अभिमत है कि महाकवि का जन्म मध्यप्रदेश के रामटेक नामक ग्राम में हुआ था. वहीं कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म उड़िसा अथवा बंगाल में हुआ था. परंतु बिहार राज्य के मिथिला वासियों का दावा है कि महाकवि कालिदास भी मिथिला कोकिल विद्यापति  की तरह ही मिथिला की महान विभूति थे. यानि उनका जन्म मिथिला के उच्चैठ नामक ग्राम में हुआ था, जहाँ वर्तमान में दुर्गा स्थान है, जो छिन्नमस्तिके मॉं दुर्गा के नाम से विख्यात है. और यह मंदिर यहाँ प्राचीन काल से अवस्थित है. परंतु मेरी समझ से ये सारे तथ्य पूर्णतः मनगढंत, तथ्यहीन और अविश्वसनीय हैं. हाॅं, महाकवि कालिदास के मिथिला में होने के कुछ प्रमाण प्राप्त हुए हैं, परंतु इन प्रमाणों से यह ज्ञात नहीं होता कि उनका जन्म मिथिला में ही हुआ था. यह माना जा सकता है कि उन्होंने अपनी पत्नी विद्योत्तमा द्वारा दुत्कारे जाने के बाद क्षुब्ध होकर अपना गृह त्याग दिया हो और भटकते, हुए मिथिला के उच्चैठ नामक ग्राम में आ गये हों, जहाँ किंवदंती के अनुसार माँ भगवती ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर महाविद्वान होने का वरदान दिया हो. परंतु प्रगतिशील सोच के विद्वानों का मानना है कि महामूर्ख नीलकंदन (कालिदास) को महाविद्वान बनाने का श्रेय उनकी विदुषी पत्नी विद्योत्तमा को दिया जाना चाहिए. क्यों कि विद्योत्तमा ने ही अपने मूर्ख पति नीलकंदन को व्याकरण से लेकर सभी उपनिषदों, तथा शास्त्रों की शिक्षा दी थी. अपनी पत्नी द्वारा शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात मूर्ख नीलकंदन महाविद्वान कालिदास बन गये. तो

आइए जानते हैं कैसे मूर्खाधिराज और निर्धन नीलकंदन का विवाह मालवा राज्य की राजकुमारी विद्योत्तमा के साथ सम्पन्न हुआ.

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  उन दिनों (375-80 ई० यानि चौथी शताब्दी में) मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी और मगध साम्राज्य पर गुप्त राजवंश का शासन था. राजा थे चन्द्रगुप्त द्वितीय, जिन्हें विक्रमादित्य के नाम से भी जाना जाता है. महाराज चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने शकों का संहार करके भारत को विदेशियों से मुक्त किया था. इन्होंने अपनी राजधानी उज्जैन में स्थापित की. मगध साम्राज्य के अधीन एक राज्य था मालवा. यहाँ के राजा थे शारदानंद. महाराज शारदानंद की एक पुत्री थी, जिसका नाम था राजकुमारी विद्योत्तमा. राजकुमारी विद्योत्तमा पूर्ण युवती हो चुकी थी और वह जितनी ही खुबसूरत थी, उतनी ही विदुषी भी. राजकुमारी विद्योत्तमा को अपनी सुन्दरता और विद्वता पर काफी घमंड था. उसकी सुन्दरता तथा विद्वता पूरे भारत के साथ साथ पड़ोसी राज्यों में भी विख्यात हो चुकी थी. चूंकि वह पूर्ण युवती हो चुकी थी, इसलिए महाराज शारदानंद शीघ्र ही अपनी पुत्री का विवाह करके पिता धर्म का निर्वाह कर लेना चाह रहे थे, परंतु राजकुमारी की एक शर्त थी - वह किसी ऐसे युवक से ही विवाह करेगी, जो उसे शास्त्रार्थ में पराजित कर सके. यानि जो युवक उससे भी अधिक विद्वान हो. उसके इस शर्त को  जानकर महाराज शारदानंद चिंतित हो गये. उन्होंने अपनी पुत्री को समझाने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु, व्यर्थ. विवश होकर उन्होंने पूरे मगध साम्राज्य में घोषणा करवा दी कि जो कोई भी मेरी पुत्री राजकुमारी विद्योत्तमा को शास्त्रार्थ में परास्त करेगा उसे वे अपनी पुत्री के साथ साथ अपना आधा राज्य भी प्रदान करेंगे. उनकी घोषणा को सुनकर पड़ोसी देश के राजकुमारों से लेकर  विद्वान ब्राह्मण कुमारों में भी राजकुमारी विद्योत्तमा को पराजित करने की होड़ मच गयी. प्रत्येक दिन दस बीस की संख्या में  राजकुमार के साथ साथ ब्राह्मण कुमार राजदरबार में पधारने लगे और राजकुमारी से पराजित और होकर वापस जाने लगे. एक दिन वाराणसी के दो स्वाभिमानी ब्राह्मण कुमार, जो स्वयं को प्रकांड विद्वान समझ रहे थे, राज दरबार में राजकुमारी से शास्त्रार्थ हेतु पधारे परंतु वे सभी भी राजकुमारी से पराजित हो गये. राजकुमारी ने उन्हें अपमानित करके राजमहल से विदा किया. इससे उन दोनों ब्राह्मणों के स्वाभिमान को चोट पहुॅंची और उनलोगों ने किसी भी तरह से राजकुमारी के घमंड को चकनाचूर करने की एक योजना बनाई. उस योजना को मूर्तरूप प्रदान करने हेतु वे दोनों एक ऐसे महामूर्ख युवक की तलाश में निकल पड़े जो सिर्फ मूर्ख ही नहीं बल्कि सुन्दर भी हो. काफी भटकने के पश्चात उन्हें मालवा राज्य के एक गाँव में वैसा युवक मिल ही गया. वह युवक एक पेड़ पर बैठकर उसी टहनी को काट रहा था, जिस पर वह बैठा था. उसके इस करतुत को देखकर वाराणसी के वे दोनों कपटी ब्राह्मण हॅंसने लगे. उस युवक से भी अधिक मूर्ख उन्हें दूसरा कौन मिलता.? उन दोनों ने मिलकर उस युवक को पेड़ से नीचे उतारा और उससे कहा -"देखो यदि तुमने हमारी बातें मान ली तो तुम्हारी शादी मालवा की राजकुमारी से करवा देंगे. और मालवा का आधा राजपाट भी तुम्हे दिलवा देंगे." वह युवक, जो वास्तव में  नीलकंदन (कालिदास) था, उन कपटी ब्राहमणों के बहकावे में आ गया और उन्हें अपनी स्वीकृति दे दी. उनलोगों ने उस युवक को मौन धारण करने की हिदायत दे दी और बतला दिया कि राजकुमारी उससे जो भी प्रश्न करेंगी उसका उत्तर वह हाथ के इशारे से देगा. दोनों ब्राह्मणों ने न सिर्फ नीलकंदन की बल्कि स्वयं की वेशभूषा बदल लिया. अब नीलकंदन प्रकांड विद्वान नजर आ रहा था. वे दोनों उसके शिष्य बन गये. फिर  वे दोनों नीलकंदन को लिये हुए मालवा के राजदरबार में पहुंचे और राजकुमारी से शास्त्रार्थ करने की आज्ञा मांगी. महाराज को उन तीनों को देखकर काफी प्रसन्नता हुई और उन्होंने शास्त्रार्थ समारोह का आयोजन खुले मैदान में आम नागरिकों के बीच करवाए जाने की आज्ञा दी.  उस समय दरबार में राजकुमारी विद्योत्तमा भी उपस्थित थी. राजकुमारी वाराणसी के उन दोनों कपटी ब्राह्मणों को पहचान नहीं पायी. उन दोनों ब्राह्मणों ने बताया कि यह युवक उनलोगों के गुरु हैं, जो इन दिनों मौनव्रत पर हैं. ये राजकुमारी जी के प्रश्नों का उत्तर अपने हाथ के इशारे से देंगे. नीलकंदन भले ही महामूर्ख था, परंतु उसके मुखमंडल पर ऐसी सौम्यता थी, जिससे उसके विद्वान होने की पुष्टि हो रही थी. प्रथम दृष्टि में ही राजकुमारी नीलकंदन की सुन्दरता पर मोहित हो गयी. 

- रामबाबू नीरव

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क्रमशः.......! 

(अगले अंक में पढ़ें राजकुमारी विद्योत्तमा एवं नीलकंदन के बीच शास्त्रार्थ, उन दोनों का विवाह तथा नीलकंदन का गृहत्याग.)

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