स देश में संगीत ,चित्रकला ,पेंटिंग जैसी कलाओं की तरह ही साहित्य भी उतनी ही पुरानी कला है । साहित्य का दुर्भाग्य रहा कि इसे अन्य भारतीय कलाओं की तरह तरजीह नहीं मिली । इसी का परिणाम है कि भारतीय साहित्य का इतिहास जैसी कोई व्यवस्था सामने नहीं आई । जबकि "भारतीय साहित्य" यह अवधारणा बनी रही और इसकी चर्चा भी होती रही । कुछ विद्वानों के लिए भारतीय साहित्य अर्थात संस्कृत में हुए कार्य । यह घोषित किया जाता रहा कि "India has one literature that is written in many Languages." अर्थात भारत का एक साहित्य है जो कई भाषाओं में लिखा गया है । लेकिन इस बात को गंभीरता से स्थापित करने की कोशिश शायद नहीं हुई । इसका कारण यह रहा कि बहुत सारी भाषाओं को समझते हुए उस में से किसी एक साहित्यिक मूल्य की पड़ताल, कठिन काम था । 

विश्व में इस तरह का कोई अन्य उदाहरण भी नहीं मिलता, जहां इस तरह की किसी परंपरा पर काम हुआ हो ।एक कारण यह भी था कि आजादी के पूर्व सभी क्षेत्रीय भाषाओं का विकास समान रूप से नहीं हुआ और आजादी के बाद क्षेत्रीय अस्मिता की भावना अधिक प्रबल हुई अपेक्षाकृत राष्ट्रीय या एक उप महाद्वीपीय साहित्य की भाषा के रूप में । लेकिन क्षेत्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता की बीच राष्ट्रीय भावनाओं का विकास भी बहुत जरूरी है । राष्ट्रीय भावनाओं के साथ आगे बढ़ना बहुत जरूरी इसलिए भी है क्योंकि यह कड़ी आज कहीं ना कहीं खो गई है । प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत का भारतीय साहित्य कई भाषाओं में लिखा गया है । इस भारतीय साहित्य के पहले अध्येता और लेखक विदेशी विद्वान थे । इनकी दिलचस्पी संस्कृत साहित्य में अधिक रही । आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य को इन्होंने उतना महत्व नहीं दिया । 

भारतीय भाषाओं के साहित्य लेखन के जो भी प्रयास हुए उनमें साहित्यकारों और उनकी कृतियों की जानकारी देने पर बहुतायत में प्रयास हुए, लेकिन इतिहास, सिद्धांत और आलोचना से जोड़कर उन्हें व्याख्यायित करने की परंपरा नहीं रही । विदेशी विद्वानों का यह एहसान तो मानना पड़ेगा कि अनुवाद के माध्यम से उन्होंने कई तरह के क्षेत्रीय साहित्य और भाषा को विद्वानों के बड़े वृत्त के बीच चर्चा का केंद्र बनाया और भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाएं जैसी परिकल्पना हमारे सामने रखी । श्री अरबिंदो और सर आशुतोष मुखर्जी ये दो प्रमुख भारतीय नाम हैं जिन्होंने 1918 - 20 की आस-पास भारतीय साहित्य जैसी संकल्पना प्रस्तुत की ।

श्री अरबिंदो ने तो कई लेख लिखकर इस संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किए । सर आशुतोष मुखर्जी के प्रयासों से सन 1919 में कोलकाता विश्वविद्यालय में डिपार्टमेंट ऑफ मॉडर्न इंडियन लैंग्वेजेस की स्थापना हुई । यह जरूरी है कि हम क्षेत्रीय भावना के ऊपर उठकर राष्ट्र के रूप में अपने आप को देखें । राष्ट्र के स्तर पर देखें कि हम साहित्यिक स्तर पर क्या योगदान दे सकते हैं । बिना इस तरह के साहित्यिक आदान-प्रदान के न तो क्षेत्र का विकास होगा और न ही राष्ट्र का । भारत की 130 करोड़ जनता जब तक भाषायी आधार पर नहीं जुड़ेगी तब तक राष्ट्रीय तथा भारतीय साहित्य जैसी संकल्पना व्यर्थ हैं । भारतीय भाषाओं से जुड़े इस तरह के प्रश्नों को लेकर चर्चाएं लंबी हो जाती हैं जब कि आवश्यकता उनके गहन होने की है । इधर ऑल इंडिया रेडियो और साहित्य अकादमी की तरफ से भी जिन प्रयासों की चर्चा मिलती है उनमें भी किसी केंद्रीय लक्ष्य का कोई रूप निखर कर नहीं सामने आता । 

अलग-अलग विद्वानों के स्वतंत्र रूप से किए गए कार्यों को भारतीय साहित्य के नाम पर एक साथ परोस दिया जाता है । कई कार्य तो ऐसे हैं कि उनमें संदर्भों और स्रोतों का कोई जिक्र नहीं है । ऐसे में उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है । भारत में एक साहित्य है जो कई भाषाओं में लिखा गया है – सर्वपल्ली राधा कृष्णन्न के इस विचार पर आशंका इस तरह भी उठाई जा सकती है कि साहित्य भाषा पर आधारित है और भाषा, क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों एवं संस्कृति पर अवलंबित है । और अगर ऐसा है तो उन संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस देश को बहु केंद्रक रूप में देखना देखने की व्यापक, पूर्ण और समग्र प्रक्रिया होगी । समग्रता के लिए प्रयत्नशील हर घटक राष्ट्रीयता का कारक होता है । ,सादृश्य मौलिकता का सिद्धांत यह बताता है कि ना किए हुए अनुभव को भी अपने अनुभव की सादृश्यता में व्यक्त करना,कोई कोरी कला नहीं अपितु वास्तविकता की तलाश है । सीखने से अधिक सीखने की क्षमता का विकास होना चाहिए । 

सार्वभौमिक प्रतीकों के लिए नए प्रयासों की आवश्यकता है । कुछ विद्वानों ने इतिहास को एक निर्मिति माना है । जिसमें समाज बोध के साथ-साथ इतिहासकार की अपनी दृष्टि भी समाहित है । यही कारण है कि एक ही समय के कई इतिहास होते हैं । किसी समय का कोई एक इतिहास नहीं होता । वस्तुपरक इतिहास की अवधारणा, इतिहास आलेखकारी का एक तत्व/ घटक मात्र है । तथ्यों की विरलता जितनी बड़ी समस्या है, उतनी ही उनकी बहुलता भी समसामयिक संदर्भों में समस्या बनती जा रही है । साहित्य का इतिहास सामाजिक - संस्कृतियों पर अधिक केंद्रित होता है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल इसे - जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब कहते थे । मेरी समझ में शुक्ल जी समय विशेष की सामाजिक चेतना की बात कर रहे हैं । लेकिन इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि समय विशेष की राजनीतिक परिस्थितियां अपने समय की इस तथा कथित सामाजिक चेतना को प्रभावित नहीं करती होंगी । निश्चित तौर पर करती होंगी । 

इसलिए इतिहास को समझने का रास्ता इतना सीधा नहीं हो सकता । हमारी जो अपनी परंपरा रही है उसमें कोरी सूचनाओं को नहीं अपितु उसके रूपांतरण को महत्वपूर्ण माना गया है । एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हम अपनी परंपरा को भलीभांति समझने का प्रयास करें और कतिपय विरोधी मान्यताओं के बीच भी सूक्ष्म संदर्भों को तलाशने का प्रयास किया जाय । परंपरा को सामान्य रूप में उस आधिकारिक या स्वीकृत व्यवहार के रूप में चित्रित किया जाता है जो कि समय विशेष में किसी समाज विशेष में हो । 

परंपरा क्या है ? यह समझना भी जरूरी है । परंपरा सामान्य रूप से उस आधिकारिक या स्वीकृत व्यवहार के रूप में चित्रित किया जाता है जो कि समय विशेष में किसी समाज विशेष में हो । लेकिन यह स्वीकृति बनती कैसे है ? कब बनती है ? कितने दिन के लिए बनती है ? और बनी हुई स्वीकृति बदलती कैसे है ? ये प्रश्न भी जरूरी हैं । अर्थात यह जानने का प्रयास कि परंपरा का उद्गम स्थान क्या होता है ? 

इस संदर्भ में रामाश्रय राय जी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि - कोई भी विश्वास या व्यवहार शून्य में अविर्भूत नहीं होता । इसलिए वे किसी इतर तत्व को इसका स्रोत मानते हैं । मुझे लगता है कि समय और परिस्थितियों से प्राप्त अनुभव के आधार पर जीवन को अधिक सुरक्षित एवं सुगम बनाने के लिए समाज विशेष में आधिकारिक रूप से अथवा सामुदायिक स्वीकृति के आधार पर कुछ संकल्पना निर्धारित की जाती हैं । 

इन संकल्पनाओं के निर्धारण में पूर्व की वैचारिक एवं कार्मिक पद्धतियां नवाचार के प्रयोग का माध्यम बनते हुए, परिवर्तन की नई प्रक्रिया को आत्मसाथ करते हुए गतिशील होती हैं । इस गतिशीलता में सतत रूप से स्वीकृति और अस्वीकृति का द्वंद्व चलता रहता है । समय और परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलता की परिभाषा भी बदलती रहती है । ऐसे में परंपरा दरअसल एक निरंतरता है जिसमें एकदम से न तो कुछ छूट जाता है और न ही जुड़ जाता है, अपितु कुछ छूटने और कुछ जोड़ने की प्रक्रिया इस परंपरा की मूल चेतना का केंद्र है । 

जीवन के प्रांजलता,प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । वैचारिक एवं कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता का प्राण तत्व है । जीवन का उत्कर्ष भी इसी निरंतरता में है । इसलिए परंपरा को आमनाय भी कहा जाता है । यह समन्वय की प्रक्रिया है। यहां संपूरक सिद्धांत भी लागू होता है । पूर्वर्ती और उत्तरवर्ती समन्वय की प्रक्रिया में सहप्रयत्न भी जुड़ा हुआ है । परस्पर विपरीत से दिखने वाले वास्तव में परंपरा की प्रक्रिया में दोनों संपूरक हैं । 

यह एक तरह की प्रक्रियाबद्ध बंधुता (Homology) है । हमारी अस्मिता, हमारी सामाजिकता, हमारी भाषा से जुड़ी हुई है । किसी भाषा में व्यक्त संकट उस समाज का भी संकट होता है । इसी भाषायी अस्मिता का विस्तार भारत में प्रांतीय अस्मिता के रूप में भी परिलक्षित होता है । भाषावार प्रांतों का गठन इसका उदाहरण है । लेकिन इसका दुखद परिणाम यह हुआ कि प्रांतीयता का यह प्रांतीय भाव राष्ट्रीयता के भाव पर हावी हो गया । साथ ही अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा को अपनी भाषा पर संकट के रूप में समझा गया । 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 1652 भाषाएं बोली जाती थी । ऐसे में राष्ट्रीयता का भाव, इस प्रांतीयता और भाषायी अस्मिता के आगे बौना हो गया । 

राजनीतिक स्वार्थों के चलते यह बौनापन और भी बढ़ा । जबकि आपसी आदान-प्रदान से समन्वय की परंपरा बनती है । शुद्धता और पवित्रता का अति आग्रह भाषा को पंगु बना देता है । भारतीय प्रांतीय भाषाओं को कभी भी अंग्रेजी भाषा अपने अस्तित्व के लिए खतरा नहीं लगी , जब कि हिन्दी को उन्होने अपने अस्तित्व के लिए संकट के रूप में चिन्हित किया । यह धारणा कमोबेश अब भी अधिकांश प्रांतीय मनोवृतियों में बनी हुई जो राजनीतिक संरक्षण में पोषित भी होती है । यही कारण रहा कि हमारे यहां साहित्यिक आलोचना की समृद्ध परंपरा भी भारतीय साहित्य के संदर्भ में नहीं रही । आज की सच्चाई यह है कि हम गंभीर रूप से या तो क्षेत्रीय हैं या फिर अंतरराष्ट्रीय होना चाहते हैं ।यदि मौका मिले तो दोनों भी होने में गुरेज नहीं । लेकिन राष्ट्रीय होना उतना महत्वपूर्ण नहीं मानते । हिंदी की शक्ति समायोजन के गुण में निहित है । 

हिंदी प्रांतीय भाषा न होकर, एक भाव भाषा है । यह भारतीय जीवन दर्शन को राष्ट्रीय संदर्भों में अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली निर्झरणी है । अनेकानेक भाषाओं, बोलियों और सभ्यताओं के इस पुंज को प्रेम,कर्म,करुणा और प्रकाश से भरने वाले अंतः निहित केंद्र के रूप में हिंदी का लक्ष्य एवं पक्ष हमेशा से स्पष्ट रहा । भारतीयों भाषाओं के बीच समन्वय और संपर्क के सेतु रूप में हिंदी का योगदान अप्रतिम है । व्यवस्था के बीच पनपी सारी व्यथाओं को झेलते हुए घने कोहरे के बीच गुलाबी धूप की तरह हिंदी खिलखिलाती रही । सब को अपना बनाती रही,प्रेम के सौजन्य से ही । भाषायी तकनीकी विकास ने वैश्विक स्तर पर हिंदी को नया आयाम दिया । कृतज्ञतर होती हुई यह भाषा संभावनाओं का नया इतिहास रचने लगी । 

इंटरनेट, यूनीकोड, सोशल मीडिया,ब्लॉग इत्यादि के माध्यम से "स्क्रीन वाद" के इस युग में हिंदी प्रयोग,प्रतिवाद,प्रखरता और प्रांजलता के रंग में सराबोर है । भाषा का विकास नवीनता के प्रति उसके आग्रह, स्वभाव से होता है । भाषा का सामाजिक स्वरूप उसकी मूल चेतना कही जा सकती है । समसामयिक संदर्भों में कहें तो स्क्रीनवाद के इस युग में भाषा और प्रौद्योगिकी का विकास एक दूसरे पर परस्पर अवलंबित हो गया है । जनसंचार माध्यमों और इन माध्यमों के अनुसार तकनीकी रूप में ढलती हुई भाषाएं लगातार प्रचारित - प्रसारित एवं विकसित हो रही हैं । आज प्रौद्योगिकी के विकास से मानव जीवन की सभी आवश्यकताएं पूरा करने का प्रयास हो रहा है । तकनीक हमारे जीवन का एक हिस्सा हो गया है । हमारा भविष्य हमारे तकनीकी विकास का ही प्रतिरूप होगा यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है । भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में जय जवान जय किसान जय विज्ञान के साथ जय अनुसंधान की बात कही । 

इस बात से हम यह समझ सकते हैं कि भविष्य की राह विज्ञान और अनुसंधान की रोशनी से जगमगायेगी । मौलिक चिंतन का वह स्वरूप जो समाज और देश की अपनी आवश्यकताओं के अनुसार हो, उनको प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है । आवश्यकता आविष्कार की जननी है लेकिन वे आवश्यकताएं जो समाज और देश की सामाजिक, आर्थिक, सामरिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक जरूरतों से जुड़ी हों उन्हें पहचान कर उनके लिए अनुसंधान के माध्यम से नए रास्ते तलाशना अधिक तर्कसंगत एवं समीचीन है । इस तरह का अनुसंधान, मौलिक चिंतन से जुड़ा प्रश्न है । मौलिक चिंतन अपने परिवेश की भाषा अपनी मातृभाषा में ही संभव है । भारत जैसे बहुभाषी देश में अलग-अलग भाषा एवं संस्कृतियों के संलयन से एक अनोखी संस्कृति का विकास हुआ है । यह संस्कृति भारतीय संस्कृति है । अनेकता में एकता इस संस्कृति की शक्ति भी है और कमजोरी भी । कमजोरी इसलिए क्योंकि अनेकता का अंतर्विरोध एकता के लिए हमेशा चुनौती प्रस्तुत करता है । 

यह चुनौती भाषा, बोली, संस्कृत परंपराएं, मान्यताओं, धार्मिक प्रथाएं और क्षेत्रीयता इत्यादि के रूप में सामने आती रही हैं । इन चुनौतियों के पीछे सत्ता, पूंजी, व्यापार और असामाजिक तत्वों का घिनौना गठजोड़ काम करता है । भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस युग में पूरी मानवता, प्रकृति और प्राकृतिक संसाधन दोहन और शोषण की गिरफ्त में है । जल, जंगल और जमीन के साथ साथ हमारा जीवन भी जाने अनजाने दोहन व शोषण की पूंजीवादी गिरफ्त में है । उस पर भी कमाल यह कि हमें इसका एहसास भी नहीं । एक तरफ तो यह चिंतन और मौलिकता के संक्रमण का काल है तो दूसरी तरफ अनुपयोगी व्यर्थ मामूली बातों के जश्न उत्सव और सौंदर्य का समय है । यह समय आत्मकेंद्रियता, आत्ममुग्धता एवं आत्माभिमान का समय है ।

ऐसे समय में विस्थापित हो रहे जीवन मूल्यों, विचारों इत्यादि के पावन पुनर्वास की एक सार्थक लड़ाई हमें इसी पूँजी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे हथियारों के सजग उपयोग से ही सुनिश्चित करनी होगी । आज पूरे विश्व में आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रगति विकास की मूल अवधारणा बन चुका है । शायद यही कारण है कि भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गतिशीलता / नवीनता अधिक से अधिक व्यापक होते हुए दिखाई दे रही है । देश का मध्यम वर्ग तेजी से बढ़ रहा है । इस वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ रही है । बाजार इस वर्ग को लुभा रहा है और भारत क्रय - विक्रय का महासागर बनता जा रहा है । ऐसे समय में विश्व के इस सबसे बड़े बाजार में भाषा का खेल महत्वपूर्ण हो गया है । 

इस बाजार में समस्त भारतीय भाषाओं को फलने - फूलने का बड़ा अवसर दिया, क्योंकि हिंदी इन सभी के बीच सबसे बड़े भूभाग पर बोली और समझी जाती है तो स्वाभाविक था कि हिंदी के लिए यह अवसर अधिक बड़ा साबित हुआ । परिणाम स्वरुप हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन गई । यह बाजार की ही ताकत थी जो हिंदी इतने व्यापक रूप में फैल सकी । सरकारी अकादमियों और योजनाओं ने तो बस इसका मजाक बनाया या फिर अन्य भारतीय भाषाओं को इसका विरोधी । लेकिन बाजार ने सारे समीकरण बदल कर रख दिये । भारत में ज्ञान - विज्ञान और शोध की भाषा के रूप में अंग्रेजी के वर्चस्व से इंकार नहीं किया जा सकता । यह स्वाभाविक भी था । धर्म और दर्शन के इस देश ने आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की तरफ पहला कदम ही इस भाषा की उंगली पकड़कर बढ़ाया । 

अंग्रेजों के लगभग 200 वर्षों के शासन में शासन-प्रशासन की भाषा अंग्रेजी रही । आजादी के बाद से आज तक अंग्रेजी, हिंदी के साथ राजभाषा के रूप में बनी हुई है। प्रशासनिक कार्यों में हिंदी से कहीं अधिक स्वीकृत भी अंग्रेजी ही है। हिंदी अंग्रेजी के बीच एक नई पहल की आवश्यकता है । बाजार तो एकदम प्रैक्टिकल होता है । हम जानते हैं कि उसने हिंगलिश के रूप में अपना रास्ता बना लिया । यह रास्ता तकनीकी दुनिया को भी पसंद आया । यूनिकोड टाइपिंग, एसएमएस लैंग्वेज, चैट लैंग्वेज इत्यादि का जो स्वरूप विकसित हुआ वह भी दरअसल तकनीक और भाषा की अनुकूलन यात्रा का प्रतीक ही है । इतिहास गवाह है कि शुद्धता एवं पवित्रता का अति आग्रह भाषा एवं संस्कृतियों को सिर्फ और सिर्फ अपंग बनाता है । 

यह भाव ही उन्हें अछूत बनाती है और फिर उनका नाश भी कर देती है । जिस तरह जीवन अंतर्विरोध के बीच सामंजस्य की कला मानी जाती है, ठीक उसी तरह भाषा का भी जीवन है । सामंजस्य भाषाई अस्तित्व का मूल है । आप उसे उसकी जड़ों से काटकर उसके विकास का सपना नहीं देख सकते । अंग्रेजी जिस सहजता से हिंदी या अन्य भाषाओं की शब्द संपदा को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ रही है वह हमें भी करना होगा । हिंदी का यह प्रौद्योगिकी सापेक्ष सफ़र उस रास्ते पर है जहां भोर की पहली किरण की तरह उम्मीद की आंखें चमकती हैं । शब्दों के खज़ाने से खुशबू के रंग बिखरते हैं और दर्द रिहा होता है । अंतर्जाल के घने जंगलों में हिंदी वह दरख़्त है जो तकनीक की नीम धूप में मुस्कुराती है और आश्वस्त करती है मनुष्यता के उस ख्वाब के प्रति जो मनुष्यता से भी बेहतर है । 

 डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 
सहायक प्राध्यापक 
हिंदी विभाग के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय 
कल्याण (पश्चिम) महाराष्ट्र।
8090100900/9082556682 
www.manishkumarmishra.com 
manishmuntazir@gmail.com 


 संदर्भ ग्रंथ सूची : 
1. Indian literature – Edited by Arbinda Poddar – Indian Institute of Advanced Study, 1972.  
2. Understanding Itihasa – Sibesh Bhattacharya, IIAS, Shimla, 2010. 
3. Methodology of Socio-Historical Linguistic – D.D.Madhulkar, IIAS, Shimla, 1996. 
4. Postcolonial Indian Literature: Towards a Critical Framework – Satish C. Aikant, IIAS, Shimla, 2008. 
5. The Quest for Indian Sociology: Radhakamal Mukerjee and our Times – Manish Thakur, IIAS, Shimla, 2014. 
6. भाषा आलोचना और आलोचक दृष्टि – कृष्णदत्त शर्मा । - अनामिका पब्लिशर्स,नई दिल्ली,2017 । 
7. आधुनिक साहित्य: विकास और विमर्श – प्रभाकर सिंह, प्रतिश्रुति प्रकाशन कोलकाता, 2018 ।

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