संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यू जर्सी में रहने वाली लब्ध प्रतिष्ठ गजलकार और कथाकार देवी नागरानी के शब्दों में, "लगभग आठ बरस पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लघुकथा पर पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन था, जिसमें  “लघुकथा गौरव”से सम्मानित श्री गोवर्धन यादव जी से मुलाक़ात हुयी थी। इस दौरान उन्होंने मुझे अपना एक कहानी संग्रह “ तीस बरस घाटी “ दिया, जिसकी शीर्षस्थ कहानी “तीस बरस घाटी”. मैंने छ: बरस बाद अपनी सिन्धी भाषा में अनुवाद की और उसे ‘अपनी धरती’ नामक संग्रह में शामिल की. श्री गोवर्धन यादव जी साहित्य के पथ पर एक समर्पित कलमकार है, जिनकी निष्ठा उनके साहित्य के विस्तार में मिलती है।  उनके लेखन में वो धार है जो एक समर्पित कलम के सिपाही की पहचान बन जाती है। यह उनके लेखन कला की विशेषता है जो लिखे हुए को पढ़ते ही एक सजीव विवरण सामने तैरने लगता है।  वे एक बेहतरीन समीक्षक भी है, यह तब जाना जब मेरे कहानी व् ग़ज़ल संग्रह पर उनकी सिन्धी साहित्य को लेकर लिखी समीक्षाएं सामने आईं।  आज आठ बरस बाद उनसे रूबरू होते हुए कई सवाल उनके साहित्य-सफ़र के बारे में जानने के लिए मन में कुनमुनाने लगे तो मैंने उनसे साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। तो आइये उनकी जुबानी सुनते है उनके साहित्यक सफरनामे का सच। 

प्रस्तुत है "परिकल्पना समय" के लिए  गोवर्धन यादव से हुयी देवी नागरानी की बातचीत के प्रमुख अंश- 

प्रश्न-गोवर्धन जी आप हिंदी के एक स्थापित लेखक हैं, यह बताएं कि लिखने के लिये आपने पहलीबार कब कलमउठाई? 

उत्तर;- लगभग चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र से ही मैंने कविता लिखना शुरु कर दिया था।  तब शायद मैं नहीं जान पाया था कि कविता आखिर होती क्या है? एक लयबद्ध शब्द-श्रृंखला की अनुगूंज भीतर चलती रहती और मैं उसे जस का तस कागज पर उतार दिया करता था।  श्री एनलाल जी जैन जो हमें संस्कृत पढ़ाया करते थे, एक कुशल कवि के रुप में विख्यात थे।  कापी की जांच के दौरान उन्हें मेरी कापी के पृष्ठ-भाग पर लिखी एक कविता नजर आयी।  उन्होंने उसे सिर्फ़ पढ़ा ही नहीं, अपितु लगातार लिखते रहने के लिए भी प्रोत्साहित किया।  इस तरह कविता से मेरा नाता कभी नहीं टूटा, उल्टे दिनों दिन, साल दर साल और अधिक आत्मीय होता गया। 

प्रश्न-आपने गद्य व पद्य की सिन्फ़ में कविता, लघुकथा, कहानी, समीक्षा सफरनामे पर कलम चलायी है, कौन सी विधा आपके मन को अधिक भाती है? 

उत्तर- सच कहूं.....मैं कभी भी इस दुविधा में ही नहीं पड़ा कि मुझे कौन सी विधा सर्वाधिक भाती है और कौन सी नहीं भाती और न ही मैंने कभी किसी विधा को दोयम दर्जे की माना।  सभी विधाएं आखिर आती तो है साहित्य के अन्तर्गत ही में न !. फ़िर उसका वर्गीकरण करना मुझे नहीं आया और न ही मैं इसे जरुरी समझता हूँ। वस्तु-विषय के अनुसार कभी वह कविता के फ़ार्म में, तो कभी लघुकथा या फ़िर कहानी के रुप में उतरती चली जाती है। 

प्रश्न - मेरा ऎसा अनुमान है कि आप पर घर-परिवार का आन्तरिक और बाह्य असर आपके मन-मस्तिस्क पर अवश्य पड़ा होगा.कृपया बतलाएं? 

उत्तर- आपका अनुमान एकदम सही है।  आंतरिक और बाह्य वातावरण का बालमन पर प्रभाव पड़ना लाजमी है।  माँ चुंकि भगवतभक्त थीं, नियमित रुप से मानस का पाठ किया करती थीं।  कभी सिरदर्द का बहाना तो कभी कुछ और बातों का बहाना बनाकर मुझसे पढ़कर सुनाने को कहतीं और मैं उसी लय के साथ पढ़ने का उपक्रम करता। पिताजी भी पुस्तकें खरीद कर लाकर देते।  उस समय गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तकें काफ़ी कम कीमत पर सहज में ही उपलब्ध हो जाती थीं जिसमें महापुरुषों के जीवन चरित्र से लेकर संस्कारों को अपनाने और जीवन में उतारने के सूत्र दिए रहते..फ़िर घर की आलमारी में और भी पुस्तकें रखी रहतीं।  पढने को मिलती रहीं।  इनके अध्ययन करने से कल्पना शक्ति में विकास हुआ।  इस तरह मैं कह सकता हूं कि घर की पाठशाला में रह्ते हुए मुझे पढ़ने का शौक जाग्रत हुआ।  फ़िर हायर सेकेन्डरी स्कूल सहित शहर का माहौल ही विविध रंगी था।  प्राचार्य सहित अन्य व्याख्याता भी साहित्य में गहरी रुचि रखते थे।  स्व.श्री शंभु प्रधान,स्व. श्री रामलाल जी शर्मा जो कभी फ़िल्मी दुनियां में क्रमशःनिदेशक और नृत्य निर्देशक रहे थे, हमें पढ़ाया करते थे।  स्व.श्री पी.कैलाश फ़िल्मों में काम कर रहे थे और स्व.श्री..शैल चतुर्वेदीजी जी हास्य-व्यंग्य कवि के रुप में पूरे देश में विख्यात हो चुके थे।  बड़े भाई के मित्र होने के नाते उनका नियमित घर आना होता था।  बाद में वे फ़िल्मों में भी आए।  ये सभी स्टेज के कलाकार थे और आए दिन नाटक खेला करते थे।  इन दिनों हर कक्षा से हस्तलिखित पत्रिका निकालने की योजना बनी।  मुझे कक्षा का साहित्य सचिव बना दिया गया।  अपनी सुन्दर लिखावट और चित्रकारी की वजह से उसे प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।  भारतीय अस्मिता के साहित्यकार कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर को पढ़ते हुए एक सूत्र हाथ लगा।  वे अपनी कविता के साथ चित्र बनाकर उनमें फ़ूल-पत्तियों से रंग उतारकर प्राकृतिक रंग भरा करते थे।  मैं भी अपनी कविता के साथ चित्र बनाकर उनमें रंग भरा करता।  उस समय की बनाई गई डायरी आज भी मेरे पास एक बहुमूल्य धरोहर के रुप में सुरक्षित है।  जब भी मैं उसके पन्ने पलटता हूँ तो दिव्य स्मृतियाँ मानस-पटल पर थिरकने लगती है।

प्रश्न-आपके लेखन का मूल स्वर क्या है? तथा उसमें आपने किन जीवन मूल्यों को अधिक महत्त्व दिया है? 

उत्तर-यहां मैं आपके दो प्रश्नों को एक साथ ले रहा हूँ पहला- लेखक का मूल स्वर क्या है और दूसरा-अनुभूति से अभिव्यक्ति तक के सफ़र के बारे में है। मैं यहाँ स्पष्ट कहना चाहूंगा कि जब जीवन में रोजमर्रा की कशमकश, अस्थिरता, संवेदनहीनता, दमन, उत्पीड़न, डर और आतंक आदि का साया हो तो एक जागरुक लेखक के स्वर में सामाजिक सरोकारों के स्वरों के साथ, कारुणिक पीड़ा और आक्रोश भी होना चाहिए, विरोध करने और जताने की क्षमता होनी चाहिए। उसके स्वर में मुक्तिकामी जनता की आकाँक्षाओं के मुताबिक परिवर्तन करने के औजार भी होने चाहिये. लगभग मेरे भी यही स्वर है।  चाहे वह मेरी लघुकथाएँ हो, कहानियाँ हो इनके पात्र डर कर सिमट नहीं जाते,... दुबक नहीं जाते... बल्कि आक्रोशित होकर उसका मुकाबला करते हैं।  और यह होना भी चाहिए. एक जागरुक लेखक, समाज में जो भी घटित हुआ देखता है, जो समाज के लिए हानिकारक है, जो समाज को अराजक और रुग्ण बना देने वाला है, तो लेखक तटस्थ कैसे बैठा रह सकता है? उसे बैठा नहीं रहना चाहिए।  उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठनी चाहिए।  यही भाव तो वह अपने पात्रों के बीच घटते देखना चाहता है।  अगर ऎसा नहीं किया गया तो जीवन-मूल्य बचे ही कहाँ रह जाएंगे? बस, इसी सोच के चलते मुझे कलम थामनी पड़ी. इस तरह कहानियों, लघुकथाओं और लेखों आदि के माध्यम से मैं अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करने में कामयाब हो पाया। 

प्रश्न-आप एक लंबे समय से कविताएं लिखते आ रहे हैं. कुछ विशेष उपलब्धियों के बारे में आप बतलाना चाहेंगे? 

उत्तर- जी..अपने छात्र जीवन में रहते हुए ही मेरा जुड़ाव कविता से हो गया था जैसा की मैं ऊपर स्वीकार भी कर चुका हूँ।  जहाँ तक उपलब्धियों की बात आप कह रही हैं।  तो इस विषय में मेरा अपना मानना है कि कविता आदमी को एक मुक्कमल इंसान बनाती है।  उसे सही जीवन जीने की कला सीखाती है।  संस्कारों का बीजारोपण करती है।  जीवन में कविता का आना याने “रस” का आना है, आनन्द का आना है।  इस तरह आप हमेशा “रसवान” बने रहते हैं।  कविता का एक बीज जो अनायास ही मन के आंगन में कभी ऊग आया था, उसमें उत्तरोत्तर विकास होता गया और अब वही छतनार बेल पल्ल्ववित और पुष्पित होकर अपनी सुरभि से वातायण को सुवासित करती रहती है।  मैं समझता हूँ कि इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है?

प्रश्न- कविता से आपका जुड़ाव प्रारंभिक अवस्था से ही रहा है।  आश्चर्य है कि कविता का कोई संग्रह अब तक आपने प्रकाशित नहीं करवाया? इसी से जुड़ा दूसरा प्रश्न है कि कहानियों के अलावा साहित्य की अन्य किसी विधा पर भी आपने कलम चलाई है।  जैसे लघुकथाएं.लेख-आलेख-संस्मरण-समीक्षा आदि।  

उत्तर- कविता ही मेरा ऎसा प्लेटफ़ार्म रहा है, जहाँ से मैंने साहित्य जगत में प्रवेश पाया था।  निश्चित ही कविताओं का संग्रह अब तक निकल जाना चाहिए था लेकिन किन्ही कारणों से ऎसा नहीं हो पाया।  बाद में कविताओं का संग्रह पुस्तकाकार में न होकर ई-बुक में हुआ है, जिसे मेरे मित्र श्री रविशंकर श्रीवास्तवजी ने “रचनाकार” के माध्यम से प्रकाशित किया है। इसके अलावा मैंने लगभग देढ़-दो सौ लघुकथाएं भी लिखी हैं।  इसके अलावा मैंने अपने कई रचनाकार मित्रों की प्रकाशित पुस्तकों पर समीक्षा आलेख भी लिखे है, जिनकी संख्या लगभग दो दर्जन से अधिक हैं साथ ही मैंने कई आलेख भी लिखे हैं। कंप्युटर पर अभी यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं।  मेरी कोशिश है कि जितनी जल्दी हो सके, इन सबको ई-बुक्स की शकल में प्रकाशित करवा लिया जाए।

प्रश्न- गोवर्धन जी पाठकगण आपसे यह जानना चाहेंगे कि वह कौन सी कहानी थी जिसे आपने पहली बार लिखी और उसे कितनी व्यापकता/सफ़लता मिली? 

उत्तर- सबसे पहले मैने जो कहानी लिखी थी, उसका शीर्षक है- एक मुलाकात।  बड़ी ही दिलचस्प कहानी बन पड़ी है।  पाठकों को अन्त तक पता ही नहीं चल पाता कि इसमें दूसरा पात्र कौन है ?. इसे आप फ़ैंटेसी की श्रेणी में भी रख सकती हैं।  आप जानना चाहेगीं कि आखिर वह सख्स कौन था, जिससे मेरी पहली मुलाकात, सड़क के एक ऎसे मोड़ पर होती है, जब मैं नये साल का जश्न न मना पाने के गम को पाले हुए, बेगाबाऊण्ड की तरह घूम रहा था? वह था मेरा वक्त, जो नए और पुराने साल के मिश्रित रुप में मुझसे मिलने आता है और कई महत्वपूर्ण और जरुरी सीख देकर गायब हो जाता है।  इस कहानी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें आप केवल वर्ष बदलते रहें, यह पुनर्नवा होती जाएगी।

प्रश्न-आपने कई कहानियाँ लिखी हैं, उनमें आप कोई विशेष लक्ष्य के आधार पर कहानियों के पात्रों को ढालते हैं, जैसे कि राजनीति, धर्म या अब समाज में हो रहे औरतों पर अत्याचारों पर उभार लाने के लिए? 

उत्तर- एक धनुर्धर जब तक अपने लक्षय का निर्धारण नहीं कर लेता, तब तक वह निशाने पर तीर का संधान कैसे कर सकता है? यदि वह ऎसा करता है तो तीर निशाने पर कभी नहीं लगेगा, चाहे वह कितनी ही बार उसकी पुनरार्वृति क्यों न करता रहे।  कई-कई बार साधने के बाद ही साध्य सधता है।  अतः सबसे पहली आवश्यक शर्त तो यहीं है कि आप लक्ष्य को फ़ोकस कर लें। सफ़लता आपके कदमों को चूमेगी।  यह साधना है।  साध्य और साधक के बीच केवल होता है तो उसका लक्षय ही होता है। यही बात कहानीकारों के लिए भी लागु होती है। एक बार लक्ष्य का निर्धारिण हो गया तो भाषा सधने लगती है। शब्द शक्ति का संचरण अपने आप होने लगता है। फ़िर शब्द ही तो लेखक के खरे औजार होते हैं। वे ही कहानी को प्राणवान बनाते है। इससे रचना की विश्वसनीयता बढ़ती है। यथार्थ सामने आता है। यही यथार्थ, व्याकुलता पैदा करता है, पड़ताल में जाने को बाध्य करता है तथा एक ऎसे क्षोभ को पैदा करता है जो कभी भी लपटों में बदल सकता है।एक जागरुक लेखक अपने आस-पास बहुत कुछ घटता हुआ देखता है, जो न तो समाज के हित में है और न ही देश के हित में। यही बात उसे कचोटती है और वह उस पर कलम चलाने के लिए मजबूर हो जाता है। सबसे असहाय और मजबूर होती हैं औरते। औरतें, बेटी, पत्नि और माँ होने तक अनेक स्तरों पर तरह-तरह की उपेक्षा- अतृप्ति-उदासी-अधीनता आदि सहने को विवश हैं, जिनके कारण कुंठाएँ और मानसिक ग्रंथियाँ उन्हें घुट-घुटकर पगलाते जाने की हद तक तोड़ती रहती है। इन तमाम तरह के जुल्म सहने के बाद भी वह परिवार की इकाई को टूटने नहीं देना चाहती। न चाहते हुए भी उसे कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं और वह लेती भी हैं। मेरी अधिकांश कहानियों में नारियां ही प्रमुखता से स्थान पाती रही हैं और बड़ी ही निडरता और बेबाकी के साथ, वे हर परिस्तिथियों से अपने को उबार लेती हैं।

प्रश्न—साहित्य जगत में साहित्य के वर्गीकरण के अनेक स्वरूप हैं,समकालीन,प्रगतिवाद,नारिवाद,बालसहित्य तथा दलित साहित्य. क्या आप ने खुद को किसी वर्ग के तहत अपनी कलम को मोड़ दिया है?

उत्तर- मैंने लगभग हर विधा पर कलम चलाई है।  लेकिन किसी वाद के चक्कर में कभी नहीं पड़ा।  और न ही मैं इसे उचित मानता हूँ।  यह मेरी अपनी सोच है।  फ़िर साहित्य आखिरकार साहित्य ही होता है और कुछ नहीं।  माफ़ करें...अब यह समय की बलिहारी है कि उसे भी खेमे में बांट दिया गया है।  कोई दलितवाद को लेकर तो कोई नारीवाद आदि को लेकर अलग-अलग खेमों में बंट कर तरह-तरह के विमर्शों को जन्म दे रहे हैं या दे चुके हैं। मैं किसी ऎसे विमर्श या वाद के जंजाल में फ़ंसना भी नहीं चाहता।  एक लेखक का धर्म और उत्तरदायित्व बनता है कि वह उस कमजोर और सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करें, जो पीड़ित है, उपेक्षित है, शोषित है, हांसिए से बाहर फ़ेंक दिया गया है, उसके पक्ष में उसे खड़ा होना चाहिए।  मेरी कहानियाँ हों या लघुकथाएं, उनमें दलित है, आदिवासीजन है और घोर उपेक्षित नारियाँ भी हैं और भी अनेक पात्र हैं।  जो सबकी सब, कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार के उत्पीड़न के शिकार है। वे सारे आघातों को झेलते हुए सम्मान के साथ अपना सिर उठाकर, उठ खड़े होते हैं। 

प्रश्न-क्या आप को लगता कि लेखक समाज़ में परिवर्तन कर सकता है ?

उत्तर- एक लेखक अपनी लेखनी के माध्यम से सामान्य जनता को सामाजिक और राजनैतिक समझदारी देने और सड़ी गली जीवन व्यवस्था को नष्ट कर एक नए समाज की रचना का संकल्प लेकर चलता है।  उसके लेखे से समाज सुधर हो जाएगा, ऎसा कोई भी लेखक दावे के साथ नहीं कह सकता।  लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि उसका प्रभाव समाज पर पड़ता जरुर है।  मैंने इसी पीड़ा को लेकर, प्रख्यात साहित्यकार श्री विष्णु खरे जी से व्याकुल होकर पूछा था. इसके जवाब में उन्होंने कहा था- “यह उस सीमा रेखा की खोज है जिसके एक तरफ़ अर्थहीन शोर है और दूसरी तरफ़ जड़खामोशियाँ।  साहित्य इन दोनों स्थितियों के बीच इतिहास की तमाम विडम्बनाओं और त्रासदियों से गुजरता हुआ, तमाम तरह के धोकों, फ़रेबों, प्रपंचों और बदकारियों का सामना करता हुआ, भरोसे का एक निदान चाह्ता हैं और इस बुनियादी सवाल को उठाता है कि यह सब क्यों?. एक लेखक का उद्देश्य केवल और केवल यही होना चाहिए कि वह अपने पात्रों के माध्यम से ही सही, बुनियादी प्रश्न उठाये और कोई समाधानकारक हल खोजे जाने का प्रयास करे।  मैं समझता हूँ कि समाज में व्यापक परिवर्तन लाने का इससे सुगम, सरल रास्ता और कोई हो ही नहीं सकता। 

प्रश्न -आखिर आपकी तलाश क्या थी और वह कौन-सी मंजिल थी,जिसे आप पाना चाहते थे?. 

उत्तर- दरअसल मेरी स्थिति ठीक उस नदी की तरह थी, जो कई अवरोधों के चलते अपनी मंजिल की ओर नहीं बढ़ पा रही थी।  शायद वह घड़ी अभी आना शेष थी।  मन में अद्म्म्य विश्वास था कि एक न एक दिन मुझे वह मंजिल जरुर मिलेगी।  संयोग देखिए कि मित्र श्री प्रमोद उपाध्याय भगीरथ बनकर एक पथ-प्रदर्शक के रुप में चलकर मेरे आवास पर आए और उस ओर मुझे लेकर गए, जहाँ मुझे वह विशाल सागर मिलने वाला था, जिससे जुड़कर मुझे अधिक विस्तारित होने का सौभाग्य भी जुड़ने वाला था। 

वे मुझे म.प्र.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन भोपाल में होने वाली पावस व्याख्यानमाला में चलने के लिए आग्रह करने लगे।  आग्रह इतना जबरदस्त था कि न कहने की गुंजाईश ही नहीं बची थी।  मुझे जाना पड़ा।  पहले सत्र की समाप्ति के बाद मेरी मुलाकात, संत पुरुष श्रद्धेय श्री कैलाशचन्द्र पंत जी से हुई।  वे हिन्दी भवन में मंत्री-संचालक हैं।  हिन्दी के प्रति उनका प्रगाढ़ प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा और कठिन प्ररिश्रम के कारण हिन्दी भवन भोपाल, आज देश का पहला एक ऎसा अनूठा संस्थान है, जिसे हम हिन्दी की तीर्थ-स्थली भी कह सकते है।  यहाँ पूरे वर्ष साहित्यिक आयोजन होते रहते हैं।  वर्ष में तीन बड़े आयोजन भी होते हैं- पावस व्याख्यानमाला, शरद व्याख्यान माला और वसंत व्याख्यानमाला। पावस व्याख्यानमाला में देश के कोने-कोने से प्रतिष्ठित विद्वान, ख्यातिलब्ध साहित्यकार और हिन्दी सेवियों सहित विशाल जन समुदाय इसमें उपस्थित होता है और अपने को कृतार्थ/धन्य मानता हैं। 

यहाँ मुझे यह बतलाना आवश्यक जान पड़ता है कि जिस राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की मैं बात कर रहा हूँ, उसकी स्थापना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने महाराष्ट्र के वर्धा ग्राम में सन 1936 में की थी. उन्होंने स्वाधीन भारत के लिए यह परिकल्पना दी थी कि- “एक राष्ट्र एक राष्ट्रभाषा” हो।  संस्था का उद्देश्य हिन्दी का प्रचार-प्रसार और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना था।  इस समिति में डा.राजेन्द्रप्रसाद (जो बाद में राष्ट्रपति बने.),राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन, सेठ जमनालाल बजाज, काका कालेलकर, ब्रिजलाल बियाणी, हरिहर शर्मा,वियोगी हरि, शंकर राव देव और बाबा राघव दास जैसे उद्भट विद्वानों ने इस संस्था में अपनी भागीदारी दी थी, इस समिति की की शाखाएं असम. उत्तर पूर्वांचल, उत्कल्म 24 परगना, मणिपुर, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, गुजरात, राजस्थान, गोवा, मुम्बई, बेलगांव, मराठवाड़ा, विदर्भ और हरियाणा सहित विदेशों में भी कार्यरत है। 

हिन्दी के उन्नयन एवं प्रचार-प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा द्वारा प्रादेशिक इकाइयों के माध्यम प्राथमिक,प्रारंभिक,प्रवेश,राष्ट्रभाषा परिचय, कोविद, राष्टभाषा रत्न तथा राष्ट्रभाषा आचार्य आदि परिक्षाओं का संचालन भी करती है. देश के लाखों लोग प्रति वर्श विभिन्न परीक्षा केन्द्रों के माध्यम से हिन्दी सीखते-पढ़ते हैं और डिग्रियां प्राप्त करते है.

एक ऎसी महान संस्था जिसकी स्थापना स्वय़ं महात्मा गांधी जी ने की हो, जुड़ने का सौभाग्य मुझे मिला।  इससे जुड़कर मैं गौरवान्वित हुआ हूँ।  शायद यही वह मंजिल थी, जिसकी की मुझे तलाश थी। 

प्रश्न-क्या जीवनमें कभी कुछ ऐसे क्षण आए, जब आपने खुद को लिखने के लिए विवश महसूस किया हो?

उत्तर- निश्चित रुप से ऎसे क्षण मेरे जीवन में बार-बार आते रहे हैं. मेरे साथ ही क्या, हर एक लेखक के जीवन में ऎसे अवसर आते हैं कि उन्हें कलम उठाना ही पड़ता है।  मुझे भी हर बार लिखने के लिए विवश होना पड़ा है।  यदि ऎसा न हुआ होता तो मैं शायद ही कहानियाँ-लघुकथाएँ आदि न लिख पाता। 

प्रश्न-साहित्य-रचना और व्यक्तिगत जीवन का तालमेल? अथवा कोई और स्थिति?

उत्तर- बहुत ही सुन्दर प्रश्न है यह आपका।  व्यक्तिगत जीवन में और लेखकीय जीवन में तालमेल बैठाना अत्यन्त ही आवश्यक पहलू होता है।  जीवन की घनघोर व्यस्तताएं और डाकघर के काम की अधिकता की वजह से मुझे हर रोज इस झंझावत से गुजरना होता था और कई बार लेखन कर्म से दूर भी रहना पड़ता था। लेकिन जैसे ही मैं अपने आपको सामान्य/मुक्त महसूस करने लगता, मेरा लेखक जाग उठता और मैं लिखने में जुट जाता।  मैं इस बात से सरासर इनकार करता हूं कि मैंने एक ही बैठक में सारा रचना-कर्म कर लिया है।  सब काम टूकड़ों-टुकड़ों में ही चलता रहता है और एक दिन पूर्णता को प्राप्त करता है।  यहाँ मैं यह बतलाना जरुरी समझता हूँ, और वह यह कि मैंने अपनी नौकरी एक डाक सहायक के रुप में शुरु की थी और पोस्टमास्टर हायर सिलेक्शन ग्रेड से सेवानिवृत्त हुआ. उस समय तक मेरी सर्विस सैतीस साल की हो चुकी थी. निश्चित ही मेरी जवाबदारियाँ और ज्यादा बढ़ गई थी. इस स्तिथि में मैं अपने लेखकीय कर्म में पूरी तन्मयता से जुड़ नहीं पा रहा था।  मैंने तत्क्षण निर्णय लिया कि अब मुझे सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य साधना में जुट जाना चाहिए और शेष जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, वह समाज को देना चाहिए।  काफ़ी समय पूर्व ही मैं घर की सारी जिम्मेदारियों से मुक्त भी हो चुका था।  अतः मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लिया। अब समय ही समय है।  किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।  मैं पूर्णतः संतुष्ट हूँ कि मैंने जो किया, वह उचित ही था। 

प्रश्न -आप नेट पर भी काफी सक्रिय हैं, आपको लगता है कि नेट पर लिखा हुआ पुस्तकों के प्रकाशन का स्थान ले सकता है? या यह केवल अधिक पाठकों तक पहुंचने का ज़रिया है? आपके प्रकाशित साहित्य से भी पाठकों को अवगत कराएं। 

उत्तर.-पुस्तकों का अपना विशेष महत्व है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।  लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि एक पुस्तक के प्रकाशन के पीछे कितने ही वृक्षों की बलि देनी पड़ती है।  अगर यही क्रम चलता रहा तो एक दिन इस धरती से पेड़-पौधों का सफ़ाया हो जाएगा।  अगर पेड़-पौधे पृथ्वी पर नहीं रहे तो प्राणीवर्ग की सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती।  इस आने वाली विभीषिका से बचने का एकमात्र तरीका यही है कि हमें एक ऎसी उन्नत टेकनालाजी को प्रयोग में लाना चाहिए,जिससे पर्यावरण भी सुरक्षित रह सके और पुस्तकें भी लिखी जा सकें. कंप्युटर एकमात्र विकल्प के रुप हमारे सामने आता है।  आज जीवन के हर छोटे-बड़े काम इसी के माध्यम से पूरे हो रहे हैं।  शायद ही कोई ऎसा काम बचा हो, जिसे कंप्युटर पूरा न कर पा रहा हो। 

मैं विलम्ब से ही सही, साठ वर्ष की उम्र में कंप्युटर से जुड़ा।  इस जुड़ाव से अनेकानेक फ़ायदे मुझे मिले।  जहाँ अन्य लेखकों की पुस्तकें पढ़ने को मिलती रहीं, साथ ही मेरी रचनाएं भी पलक झपकते ही देश के विभिन्न स्थानों सहित विश्व के कोने-कोने में पहुँचने लगी।  यू.के से प्रकाशित होने वाली ई-पत्रिका लेखनी हो,कनाड़ा से साहित्यकुंज हो, लंदन से पुरवाई हो, दुबई से अनुभूति हो या फ़िर हालैण्ड से प्रकाशित होने वाली पत्रिका अमस्टेलगंगा हो, मेरी रचनाएं स्थान पाने लगी हैं.इन रचनाओं को विश्व के किसी भी कोने में बैठकर पढ़ा जा सकता है।  अब तक करीब दो सौ से ऊपर पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं।  अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचने का इससे सुलभ और सरल रास्ता और क्या हो सकता है।  फ़िर इसी इंटरनेट के माध्यम से ही मैंने मारीशस के अपने कथाकार/उपन्यासकार मित्र श्री रामदेव जी धुरंधरजी का साक्षात्कार लिया था।  और आप भी मेरा साक्षात्कार ले पा रही हैं। 

आज भले ही यह असंभव सा लग रहा होगा,लेकिन आने वाले समय में इसका और अधिक विस्तार होगा और पुस्तकों की जगह ई-पुस्तकों का बड़ी मात्रा में प्रकाशन संभव हो सकेगा।

प्रश्न-आपकी अब तक कितनी किताबों की ई-बुक्स बन चुकी है? 


उत्तर- अब तक मेरे दो कहानी संग्रह-(१) “महुआ के वृक्ष”(२) “तीस बरस घाटी” क्रमशः पंचकूला (हरियाणा) से तथा वैभव प्रकाशन रायपुर से प्रकाशित हो चुके हैं।  इन दोनों को ई-बुक्स में तब्दील कर दिया गया है।

प्रश्न-क्या सम्मान पाने के लिए कोई माप-दंड है जिससे लेखक व उसके लेखन का मूल्यांकन सामने आये? आपको मिले सम्मान और प्राप्त पुरस्कासरों के बारे में कुछ बताएं? और मिलने पर क्या महसूस करते हैं?

उत्तर- सम्मान पाने के लिए एक निश्चित माप-पंड होता है।  अब यहाँ यह देखना-परखना आवश्यक होता है कि लेखक ने अपने लेखन कर्म में जो ऊर्जा लगाई है वह कितनी समाजोपयोगी है...कितनी आचरण करने योग्य है..और समाज को कितनी सकारात्मक दिशा दिखाने में अपना सामर्थ्य रखती है।  इसके और भी माप-दण्ड हो सकते हैं।  इन सभी माप-दण्डॊं पर खरा उतरने के बाद ही आपकी कृति सम्मान पाने की हकदार होती है, सम्मान उस कृति का होता है, और उस सम्मान को पाकर व्यक्ति सम्मानित होता है।  ऎसा मेरा मानना है।  मुझे प्रदेश और प्रदेश से बाहर अब तक बीस से अधिक साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है, निश्चित ही सम्मान पाने पर हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव होता ही है, हौसले में बढ़ौतरी होती है कि आप समाज और देश को, अपने जीवन का जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, अधिक से अधिक देने के लिए संकल्पवान होते हैं ।  

प्रश्न-मै जानना चाहूंगी कि क्या आपकी कहानियोँ अन्य भाषाओं में अनुवादित हुई हैं? 

उत्तर- जी हाँ..मुझे यह बतलाते हुए अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है कि मेरी कहानियों का सिंधी, मराठी, ऊर्दू, राजस्थानी, उड़िया, तथा बंगाली भाषा में अनुवादित हो चुकी हैं सिंधी भाषा में अनुवादित करने वाली तो आप स्वयं ही हैं।  आपको अनेकानेक साधुवाद। 

प्रश्न- साहित्य साधना में रत रहते हुए आपने किन-किन देशों की यात्राएं की हैं. हम जानना चाहेंगे?. 

उत्तर:-मैं आभारी हूँ ईश्वर के प्रति कि जिनकी कृपा से मुझे भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक यात्राएँ करने का तथा देश की कई अन्य साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ने और भाग लेने के अवसर मिले हैं तथा थाईलैण्ड, इण्डोनेशिया,.मलेशिया, क्वालालमपुर, नेपाल, मारीशस और भूटान जाने और हिन्दी के उन्न्यन और प्रचार-प्रसार करने के सुअवसर प्राप्त हुए हैं। 

प्रश्न- मेरा अन्तिम और जरुरी प्रश्न, और वह यह कि आपको अपनी साहित्य साधना में परिवार का कैसा सहयोग मिला, हम जानना चाहेंगे?

उत्तर:- निश्चित ही यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और इसे जानने का आप सबका अधिकार भी बनता है। मेरी पत्नि श्रीमती शकुन्तला यादव जो स्वयं एक कुशल लोकगीत गायिका है और लोकगीत रचियता भी हैं।  उनके गाए गीत आकाशवाणी से निरन्तर प्रसारित होते रहते हैं।  वे वर्तमान में, समाज की महिला प्रकोष्ट की अध्यक्ष है और संकल्प रामायण महिला मंडल की संचालक-अध्यक्ष भी हैं।  बड़ा बेटा- डा.आलोक यादव इंदिरा गांधी पालिटेक्निक कालेज में प्राचार्य के पद पर पदासीन है, इनकी अब तक दो किताबें प्रकाशित हो चुकी है, जो कालेज स्तर पर पढ़ाई जा रही है।  साहित्य में विशेष रुचि रखते है. बड़ी बहू श्रीमती सुशीला यादव, छिन्दवाड़ा प्रमुख डाकघर में डाक सहायक हैं. दूसरा बेटा- रजनीश यादव, गुडविल अकाउन्ट अकादमी के निदेशक हैं।  बहू श्रीमती शैली यादव- उत्कुष्ट विद्यालय परासिया में गणित विषय की व्याख्याता है।  साहित्य से लगाव है। अपनी शाला के सहित 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन करती है। चि. रजनीश और शैली दोनों ही पूर्व में आकाशवाणी छिन्दवाड़ा में उद्घोषक भी रहे हैं।  बेटी श्रीमती अर्चना यादव, महिला पालिटेकनिक में व्याख्याता है और दामाद श्री पप्पु यादव जी राजनीति के क्षेत्र के साथ ही होटल व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।  इन्हें भी साहित्य के प्रति अनुराग है।  मैं आभारी हूँ परमपिता परमेश्वर के प्रति कि मुझे इतना सुगढ़, विचारवान और ऊर्जावान परिजनों का साथ मिला। इन सभी से मुझे साहित्यिक गतिविधियों में सकारात्मक सहयोग मिलता रहा है. मुझे अपने परिवार पर बहुत गर्व है।

तो ये थे श्री गोवर्धन यादव जिनके प्रतिउत्तरों में उनके साहित्यक सफ़र का सफ़र सतत जारी है।  साधक की तरह अपने काम को निष्ठां के साथ करते हुए परिवार, परवेश व् समाजिक कार्यों से जुड़े रहकर साहित्य के समर्पित जीवन पथ पर चल रहे हैं। 

मैं  देवी नागरानी, कहानीकार/ गजलकार, शिक्षिका,न्यूजर्सी,(यू.एस.ए) से। 

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