नई दिल्ली. गुरुवार शाम 5.05 बजे 'काल के कपाल पर लिखने-मिटाने' वाली अटल आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का वे 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। विगत दो महीने से एम्स में भर्ती थे। लेकिन, पिछले 36 घंटों के दौरान उनकी सेहत बिगड़ती चली गई। उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था। इससे पहले वे 9 साल से बीमार थे। राजनीति की आत्मा की रोशनी जैसे घर में ही कैद थी। वे जीवित थे, लेकिन नहीं जैसे। किसी से बात नहीं करते थे। जिनका भाषण सुनने विरोधी भी चुपके से सभा में जाते थे, उसी सरस्वती पुत्र ने मौन ओढ़ रखा था। 

अटलजी की सिर्फ एक किडनी काम कर रही थी। 30 साल से अटलजी के निजी फिजिशियन डॉ. रणदीप गुलेरिया की देखरेख में एम्स में उनका इलाज चल रहा था। 

इससे पहले गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने फिर एम्स पहुंचकर उनका हाल जाना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एम्स डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया और वाजपेयी के परिवार के साथ उनके स्वास्थ्य पर चर्चा भी की थी। गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और बीएसपी सुप्रीमो मायावती भी वाजपेयी का हाल जानने एम्स पहुंचे थे। एम्स की ओर से शाम 5.30 बजे जारी नए मेडिकल बुलेटिन में अटल बिहारी वाजपेयी के निधन की जानकारी दी गई। 

इस बीच अटल बिहारी वाजपेयी के घर पर एसपीजी की टीम पहुंच गई है, पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कई जगह पर बैरिकेडिंग भी कर दी गई है। वाजपेयी के घर कई बड़े नेता पहुंचना शुरू हो गए हैं।

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत बीजेपी के कई दिग्गज नेताओं ने एम्स पहुंच उनका हाल जाना। इनके अलावा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी एम्स पहुंचे। 

वर्ष 1988 में जब वे किडनी का इलाज कराने अमेरिका गए थे तब धर्मवीर भारती को लिखे एक पत्र में उन्होंने मौत को अपने सामने देखकर उसे हराने के जज्बे को कविता के रूप में सजाया था। "ठन गई!

मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई.
मौत की उमर क्या है?
दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं.
मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा,
कूच से क्यों डरूं?
तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा
मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर.
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई। " 
खैर अटल जी हम सभी के लिए अब स्मृति शेष हैं। मगर -

"एक सपना था जो अधुरा रह गया, एक गीत था जो गूंगा हो गया। एक लौ थी जो अनंत में विलीन हो गयी। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।" 
 
ये शब्द उसी अटल जी के हैं जिन्होंने 27 मई 1964 के दिन पंडित जबाहर लाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात् 29 मई 1964 को संसद में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहे थे। आज वे सारे शब्द उनके लिए अक्षरश: हमारे भी होठों से निकल रहे हैं। अटल जी को परिकल्पना परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि और शतश: नमन।

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