13 जनवरी: द्वितीय पुण्य तिथि पर 
मौलिक चिंतक, कथाकार, नाटककार, आलोचक और समय-संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याकार मुद्रा राक्षस हमारे बीच अब नहीं हैं। आज उनकी द्वितीय पुण्यतिथि है। अपनी लेखनी के माध्यम से समय-समय पर समाज की बुराईयों, रुढ़ियों को तोड़ने वाले एक ऐसे विद्रोही लेखक ने अचानक हमारा साथ छोड़ दिया, जिनकी रचनात्मकता में सिर्फ भारतीय समाज ही नहीं बल्कि पूरा देश और दुनिया की चिंताएँ शामिल थीं। वे चिंताएँ मानव जाति को बचाने की चिंता थी, वे मुनाफाखोर संस्कृति के खिलाफ, लूट, भ्रष्टाचार, गरीबों के शोषण के खिलाफ व्यक्त की गयी चिंताएं थीं। यही कारण था कि उनकी नाट्य रचनात्मकता के पात्र हवा-हवाई कोई काल्पनिक नायक नहीं होते थे बल्कि लोक जीवन और यथार्थ की खुरदुरी जमीन पर टिके पात्र होते थे और नाट्य विषय भी। 

मुद्राराक्षस अपने आप में एक संस्था थे। वर्चस्व की संस्कृति, विचार और समाज के समानांतर उनकी आवाज़ का एक प्रश्नाकुल संसार था। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि उन्हें सत्ता और साहित्य के हर खेमे ने हमेशा उपेक्षित किया और ऐसा स्वाभाविक ही था क्योंकि मुद्रा जी जिस प्रतिरोध की संस्कृति और आलोचना के नायक थे, उनकी चिंता निजी नहीं थी बल्कि पूरा समाज और हाशिये पर धकेल दिया गया मानव संसार उनकी चिंता के केन्द्र में था। वे बिलकुल छोटे से, चमकती आँखों वाले, हल्की-फ़ुल्की शारीरिक संरचना वाली शख्सियत थे, लेकिन विचारों से बहुत ही मजबूत और दमदार थे। यह सर्वविदित है कि भारतीय समाज और खासकर, हिन्दी साहित्य में अभिजात्य का कब्जा हमेशा से रहा है। 

मुद्रा जी ने अपने चिंतन से उस अभिजात्यपन को तोड़ने का प्रयास किया। इस क्रम में पूरे अभिजात्य समाज से उन्हें उतनी ही प्रताड़ना भी मिली। प्रताड़ित करने वाला यह अभिजात्य समाज किसी एक धारा का नही था। इसमें समाज के सामंत तो थे ही, बल्कि हिन्दी साहित्य के सामंत भी शामिल थे। ये सामंत किसी बड़े विश्वविद्यालयों में प्रगतिशील प्रोफेसर का चोला ओढ़े थे तो किसी बड़े साहित्यिक संस्थान का मठाधीश बना बैठा था। वास्तव में हिंदी जगत में वह इकलौते बागी साहित्यकार थे। बहुत ही आत्मीय किस्म के आदि बागी। साहित्यिक लिबास में एक ऐसा बागी, जिससे लोग कन्नी काटते थे। ज़िंदगी में उलटी तैराकी और हमेशा धारा के ख़िलाफ़ चलने वाला एक ऐसा बागी जिसे खुद नहीं पता कि किसे कब क्या कर और कह बैठेंगे। घर में , बाहर , साहित्य और ज़िंदगी में भी। 

अतीत की यादों में खोये हुये मुद्रा जी खुद बताते थे कि जब दिनकर की उर्वशी की जय जयकार के दिन थे तब के दिनों में उन्होंने अपनी लिखी समीक्षा में उर्वशी की बखिया उधेड़ दी थी। नाराज हो कर दिनकर ने उन से कहा कि कुत्तों की तरह समीक्षा लिखी है। तो मुद्रा ने पलट कर दिनकर से कहा कि कुत्तों के बारे में कुत्तों की ही तरह लिखा जाता है और यह सुनकर दिनकर चुप हो गए थे। मुद्रा जी साहित्य के एक ऐसे औघड़ थे जिनमें सच कहने की पूरी ताक़त थी। वे किसी से भी नहीं डरते थे। भय-भ्रम-भ्रांति उनके शब्दकोश का कभी हिस्सा नहीं रहा। उनके बारे में कहा जाता है कि वे शुरुआती दिनों में लोहियावादी थे। लेकिन बाद के दिनों में उन्हें लोहिया से मोहभंग हो गया और वे वामपंथी हो गए। लोहिया को फासिस्ट लिखने और बताने लग गए। 

बात यहीं नहीं रुकी वे आगे चलकर वामपंथियों के कर्मकांड पर भी टूटे। माकपा एम को भाजपा एम कहने से भी परहेज नहीं किया। अमृतलाल नागर के शिष्य और प्रशंसक होने के वाबजूद उन्होने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के एक कार्यक्रम में अमृतलाल नागर को बहुत ही ख़राब उपन्यासकार कह बैठे। इसी तरह वे भगवती चरण वर्मा को जनसंघी बताने से भी नहीं थकते थे। हंसते, मुसकुराते तमाम मुद्दों पर बेलौस बात करने वाले वे एक ऐसे वक्ता थे, जिन्हें अपने ऊपर पूरा भरोसा था कि उनका आकलन कभी ग़लत हो नहीं सकता। वे कभी नहीं झुके, टूटे भी नहीं और बिके भी नहीं। हिंदी जगत के ब्राह्मणवादी अवसरवाद की धूर्त छाया उन्हें छू भी नहीं सकी। उन्होने बड़े-बड़े अवसरों को ठुकरा दिया। यहाँ तक कि आकाशवाणी की बेहतरीन नौकरी छोड़ दी। राजनीतिक गलीचों को ठेंगा दिखा दिया। अकेले रहे लेकिन सबके होकर। निर्भीक, साहसी, बेलौस, विचारोत्तेजक, आन्दोलनकारी लेखक मुद्राराक्षस। 

 उनके पंद्रह से अधिक नाटकों नमें नौ छपे, बारह उपन्यासों, पाँच कहानी संग्रहों, तीन व्यंग्य संग्रहों और पाँच आलोचनात्मक कृतियों में उनकी प्रयोगधर्मिता और विलक्षण कहन शैली अद्भुत दिखती है। आला अफ़सर, दंडविधान, कालातीत, नारकीय, मरजीवा, हम सब मंशाराम, तिलचट्टा, तेंदुआ और अर्धवृत्त उनकी कालजयी कृतियाँ हैं। ‘आला अफ़सर’ उनका बहुत चर्चित नाटक है, जिसका कई-कई बार रंगमंचीय प्रदर्शन हुआ। कहा जाता है कि ‘आला अफ़सर’ रूसी नाटककार निकोलाई गोगोल के नाटक ‘इंस्पेक्टर जनरल’ से प्रेरित है। मुद्राराक्षस का उपन्यास ‘अर्धवृत्त’ भी काफी चर्चा में रहा। यह एक वृहत पाँच सौ पृष्ठों का उपन्यास है, जिसे उन्होंने राजेंद्र यादव को समर्पित किया था।  

हंस में वे राजेंद्र यादव के निष्ठावान, प्रतिबद्ध सहयोगी रहे हैं। विमर्शों को खड़ा करने में राजेन्द्र यादव के साथ मुद्राराक्षस का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। कहते हैं, हंस ऐसे ही इतना नहीं उड़ा ! उसका एक पंख राजेंद्र यादव थे और दूसरा मुद्राराक्षस। ‘अर्धवृत्त’ के औपन्यासिक विस्तार की काल्पनिक कहानी में उनके जीवन के यथार्थ बिम्ब भी दीखते हैं। साथ ही उनकी तर्कशील, विध्वंसक, विद्रोही विचारधारा भी। धर्म, रूढ़ियों और कर्मकांडों की धज्जियाँ उड़ाने वाला मुद्राराक्षस जैसा हिन्दी के पास दूसरा लेखक न था और न होगा।

-रवीन्द्र प्रभात 

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