संपादकीय 

हाकवि गोपाल दास नीरज अर्थात हिन्दी काव्य जगत का एक ऐसा दीपक, जिसकी लौ जलती रही कई युगों तक हिन्दी को प्रकाशमान बनाए रखने के लिए, बिडंबना रूपी हर अँधियारे से लड़ता हुआ वह हम सबको रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया। सच कहूँ तो उसके जाने से गूंगा हो गया है हिन्दी का गीत, अनंत में विलीन हो गया है एक महाकाव्य। वह महाकाव्य, जिसमें गूंज थी गीता की और गंध थी गुलाब की। वे देह त्यागकर गीत छोड़ गए हैं। लूट गयी भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य की अमूल्य निधि, हिन्दी का लाड़ला राजकुमार चला गया हम सबके बीच से अचानक। हिन्दी आज खिन्नमना है, उसका पुजारी सो गया। नई दिल्ली स्थित एम्स में कल उन्होने ली अंतिम सांस।  

नीरज, जीवन के दर्शन के रचनाकार थे। साहित्य की एक लंबी यात्रा के पथिक थे। गीत, कविता, दोहे और शेर, उनकी कलम हर जगह चली। मंचीय कविता के कवि के रूप में उन्हें जितनी लोकप्रियता मिली, उतनी शायद ही किसी कवि को मिली। करीब 50 साल तक वे सक्रिय लेखनी और मंच से जुड़े रहे। 

90 की उम्र में भी वह मंच पर कविता और गीत पढ़ते रहे। फिल्मों में जीवन रास नहीं आया, तो मुंबई से लौट आए, पर गीत लिखते रहे। गीत गुनगुनाते रहे और गीत को जीते रहे। राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें हिंदी की वीणा कहा था, वाचिक परंपरा के वे एक ऐसे सेतु थे जिस पर चलकर, महाप्राण निराला, पंत, महादेवी, बच्चन, दिनकर की पीढ़ी के श्रोता मुझ जैसे नवांकुरों तक पहुंच सके। क्या अंदाज था उनका गाने का। उनके स्वर ने उनके गीतों को कविता नहीं होने दिया। उन्हें गीतकार के ही रूप में जाना गया, कवि के रूप में नहीं। जबकि गीतों में वे कवि थे। वे हिंदी गीतों के इतिहास पुरुष थे। 

प्रेम, सौहार्द और जीवन-मृत्यु आदि विषयों पर बहुत रुचि से बात करने वाले नीरज, कहते थे कि "मेरी भाषा प्रेम की भाषा है. गुस्से में कभी अपना चेहरा देखना और जब प्रेम करते हों, तब देखना। क्यों साहब।" एक बार किसी इंटरव्यू में उन्होने कहा था कि,"अगर दुनिया से रुखसती के वक्त आपके गीत और कविताएं लोगों की जबान और दिल में हों तो यही आपकी सबसे बड़ी पहचान होगी। इसकी ख्वाहिश हर फनकार को होती है।" नीरज जी कहा करते थे- "इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में। न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।" 

नीरज ने साहित्य के सभी स्थापित प्रतिमानों को अपने तरीक़े से तोड़ा। कहते हैं, कि 1958 में लखनऊ रेडियो से पहली बार उन्होंने 'कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे....' पढ़ी थी। ....यही वह अमर गीत है जिसे सुनकर मुंबई वालों ने उन्हें बुला लिया कि ये हिंदी का कौन आदमी है जो कारवां जैसे शब्द लिख रहा है। तब कौन जानता था कि इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम करने के बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी करने वाला वह शख्स एक दिन हिन्दी फिल्मों का शीर्षस्थ गीतकार साबित होगा। दिल्ली के सफाई विभाग में टाइपिस्ट और कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में बाबूगिरी करने वाला वह शख्स एक दिन हिन्दी काव्यजगत का एक प्रखर स्तंभ साबित होगा।

सदाबहार नगमों के रचयिता, 'कलम के जादूगर' गोपाल दास नीरज ने दिल्ली के एम्स अस्पताल में कल अंतिम सांस ली। यह खबर मिलते ही हिंदी साहित्यजगत में दुखों का पहाड़ सा टूट पड़ा। हर शख्स के दिलो-दिमाग में नीरज की एक ऐसी अनूठी छवि बनी है जिसे भविष्य की कोई भी आंधी मिटा नहीं सकती। उन्होने समान रूप से बॉलीवुड फिल्मों में, हिंदी साहित्य में और मंचीय कवि के रूप में प्रसिद्ध रहे। 

उनके लिखे प्रसिद्ध फिल्मी गीतों में शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, लिखे जो खत तुझे, ऐ भाई.. जरा देखकर चलो, दिल आज शायर है, खिलते हैं गुल यहां, फूलों के रंग से, रंगीला रे! तेरे रंग में और आदमी हूं- आदमी से प्यार करता हूं शामिल हैं। भले ही आज गोपालदास नीरज हम सब के बीच न हो लेकिन उनके लिखे गीत बेहद लोकप्रिय रहे। साहित्य की दुनिया ही नहीं बल्कि हिन्दी फिल्मों में भी उनके गीतों ने खूब धूम मचाई। 1970 के दशक में लगातार तीन वर्षों तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

साल 1991 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्हें साल 2007 में पद्मभूषण दिया गया। यूपी सरकार ने यशभारती सम्मान से भी नवाजा। 'कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे' जैसे मशहूर गीत लिखने वाले नीरज को उनके बेजोड़ गीतों के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला है। 'पहचान' फिल्म के गीत 'बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं' और 'मेरा नाम जोकर' के 'ए भाई! ज़रा देख के चलो' ने नीरज को कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचाया। उनके एक दर्जन से भी अधिक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनका जन्म 4 जनवरी, 1924 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गांव में हुए था। उन्हें 1970, 1971, 1972 में फिल्म फेयर पुरस्कार मिले।

उनके चले जाने से हिन्दी आज आक्रांत है, उसका रक्षक चला गया । ऐसा लग रहा है कि हमारे विश्व हिन्दी के रंगमंच का एक ऐसा अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अंतर्ध्यान हो गया है, जिसकी गूंज आने वाली कई सदियों तक प्रकंपित करती रहेगी हम सभी को। 
अलविदा महाकवि नीरज, हमसबके प्रेरणास्त्रोत थे, हैं और हमेशा रहेंगे। 
परिकल्पना परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि। 
-रवीन्द्र प्रभात 

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