पौराणिक कथा (अष्टम आख्यान, अंतिम कड़ी) 



-रामबाबू नीरव

अनावृष्टि के बाद पूरे अंगदेश में लगातार कई दिनों तक हुए मूसलाधार बारिश से हर्ष की लहर छा गयी. युवा ऋषि ऋष्यशृंग राजमहल में ऐश्वर्य भोगने लगा. राजमहल की दासियों के साथ राजकुमारी शान्ता भी अपने पिता की आज्ञा से ऋषि कुमार ऋष्यशृंग के स्वागत सत्कार में लग गयी. यह संयोग ही था कि राजकुमारी शान्ता भी ठीक वैसी ही लग रही थी जैसी की गणिका सावंती की पुत्री शान्ता थी. इस शान्ता का सौंदर्य उस शान्ता के सौंदर्य से बीस ही था उन्नीस नहीं. ज्ञान और विद्वता से लेकर नृत्य, गीत और संगीत में भी राजकुमारी शान्ता निष्णात थी. राजकुमारी को देखकर ऋष्यशृंग इसे ही अपनी प्रेयसी समझ बैठा जिसने उसे स्त्री के अस्तित्व से परिचित कराया था. अपनी प्रेयसी गणिका शान्ता को विस्मृत कर जाने के पीछे दोष ऋष्यशृंग का नहीं बल्कि दो युवतियों के एक जैसी दिखने के भ्रम का था. अपनी प्रेयसी राजकुमारी शान्ता का मधुर सामिप्य पाकर तथा नृत्य, गीत और संगीत के सागर में डूब कर ऋष्यशृंग सत्य से अनभिज्ञ होता चला गया. राजकुमारी शान्ता को खुली छूट देने के पीछे महाराज रोमपाद का एक ही उद्देश्य था कि अपनी पुत्री का विवाह ऋष्यशृंग के साथ करवाकर वे महर्षि विभाडंक के कोपभाजन बनने से बच जाएं.

   लगभग एक सप्ताह बाद   विभाडंक ऋषि का पदार्पण चंपा नगरी में हुआ. महाराज रोमपाद स्वयं उन्हें आदर सत्कार के साथ राजमहल में लेकर आये. वैसे तो विभाडंक ऋषि अपने पिता कश्यप ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए मन ही मन महाराज रोमपाद को क्षमा कर चुके थे, परंतु महाराज के कृत्य से उनके‌ हृदय पर जो आघात हुआ था उसका घाव अभी तक भरा न था. उन्होंने थोड़ा तीखे स्वर में प्रश्न किया -"राजन, मेरा पुत्र कहाँ है.? मैंने अपने पुत्र को बाल ब्रह्मचारी के रूप में स्त्रियों के संसर्ग से अबतक दूर रखा था, परंतु आपने उसकी तपस्या और ब्रह्मचर्य को भंग करने के लिये गणिकाओं को मेरे आश्रम में भेजकर अच्छा नहीं किया.?"

"मेरी धृष्टता क्षमा करें ऋषिवर. मैंने जो कुछ भी किया वह प्रजा के हित के लिए किया. और लोककल्याण के लिए किया जाने वाला प्रपंच अधर्म नहीं होता." महाराज रोमपाद ने सफाई देते हुए अपना पक्ष रखा.

"परंतु मेरे पुत्र का अब क्या होगा, कभी सोचा है आपने?"

"जी, अवश्य सोचा है ऋषिवर."

"क्या, क्या सोचा है.?" चकित भाव से महाराज रोमपाद की ओर देखते हुए पूछा महर्षि विभाडंक ने. 

"यही कि आपके पुत्र युवा हैं, अतः उनका विवाह मेरी पुत्री शान्ता के साथ कर दिया जाए."

"क्या......?" महाराज के इस सुझाव को सुनकर चकित रह गये महर्षि विभाडंक. उन्होंने तो‌ ऐसा सोचा ही नहीं था. अपने पुत्र‌ के लिए जो कुछ उन्होंने नहीं सोचा वह राजा रोमपाद ने कैसे सोच लिया.? वे कुपित होते हुए उबल पड़े -

"ऐसा नहीं हो सकता राजन! "

"क्यों नहीं हो सकता ऋषिवर.? मेरी पत्री शान्ता सोलह लक्षणों से परिपूर्ण है. सुन्दर और पूर्ण युवावस्था को प्राप्त है, इसके साथ ही वह सभी कलाओं में भी निष्णात है." रोमपाद ने अपनी पुत्री की प्रशंसा करते हुए कहा.

"फिर भी मैं अपने पुत्र का विवाह आपकी पुत्री के साथ नहीं कर सकता."

"क्यों.....? " रोमपाद तड़प उठे.

"क्योंकि एक खास उद्देश्य से मैंने अपने पुत्र को स्त्रियों की छाया से दूर रखा था." महर्षि का रोष बढ़ने लगा.

"अब तो आपके पुत्र पर स्त्रियों की छाया पड़ चुकी है और वे अब किसी स्त्री के बिना रह नहीं सकते, इसलिए मेरी पुत्री शान्ता के साथ विवाह ही इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान है. मैं अंग नरेश रोमपाद अपनी दत्तक पुत्री शान्ता के लिए वर के रूप में आपके तेजस्वी पुत्र ऋष्यशृंग को मांग रहा हूँ, कृपया मेरे आग्रह को स्वीकार कर मुझे कृतार्थ करें." 

महाराज रोमपाद के इस आग्रह को सुनकर महर्षि विभाडंक कुछ पल के लिए मौन हो गये. उनकी अन्तरआत्मा ने भी राजा रोमपाद के कथन की पुष्टि की. फिर वे अपनी शंका व्यक्त करते हुए बोले -

"परंतु राजन आपने जिस कन्या को पाल पोस कर बड़ा किया है वह तो अयोध्या नरेश महाराज दशरथ की पुत्री है.?"

"आपका कथन सत्य है ऋषिवर, राजकुमारी शान्ता महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या की ही पुत्री है. मैंने तो मात्र उसका लालन पालन किया है."

"तब तो उसके विवाह के लिए महाराज दशरथ की सहमति भी आवश्यक है."

"हाँ ऋषिवर, महाराज दशरथ की सहमति के बिना उन दोनों का दाम्पत्य सूत्र बंधन संभव ही नहीं है. मैं अभी अपने दूत को अयोध्या भेजता हूँ."

उसी क्षण महाराज ने पत्र के साथ अपना दूत अयोध्या भेज दिया. तबतक महर्षि विभाडंक को राजमहल के अतिथि गृह में ठहराया गया. महर्षि विभाडंक ने एकांत में अपने पुत्र से उसकी इच्छा पूछी. ऋष्यशृंग ने राजकुमारी शान्ता से विवाह करने की सहमति प्रदान कर दी. 

  ऋष्यशृंग और शान्ता के विवाह की खबर पूरे राजमहल में फैल गयी. जब राजकुमारी शान्ता ने इस सुखद संवाद को सुना तब वह भी प्रसन्नता से झूम उठी और दाम्पत्य जीवन के सुन्दर स्वप्न लोक में खो गयी. वह इसे अपना सौभाग्य मानने लगी कि ऋष्यशृंग जैसे तेजस्वी ऋषि के साथ उसका विवाह होगा. 

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अयोध्यापति महाराज दशरथ ने शृंगी ऋषि (ऋष्यशृंग) और शान्ता के विवाह की स्वीकृति प्रदान कर दी और इस विवाह में महारानी कौशल्या के सा स्वयं भी उपस्थित होने का सुखद संवाद भी दूत के द्वारा प्रेषित कर दिया. यह संवाद नगरवासियों के कानों में भी पड़ चुकी थी. प्रजा भी प्रसन्नता से झूमने लगी. सावंती और उसकी पुत्री शान्ता ने जब इस सुखद संवाद को सुना तब, जहाँ सावंती को प्रसन्नता की अनुभूति हुई वहीं उसकी पुत्री शान्ता का हृदय आहत होकर तड़पने लगा. अल्प समय में ही शान्ता ऋष्यशृंग के इतने करीब आ चुकी थी कि वह अंजाने में ही उसका  चितचोर बन चुका था. ऋष्यशृंग के राजमहल में जाने के बाद उसे अनुभव हुआ कि वह ऋष्यशृंग को अपना हृदय समर्पित कर चुकी है. परंतु नौका से उतरने के बाद उस निष्ठुर ने उसकी ओर पलट कर देखना भी समुचित नहीं समझा. फिर भी अबतक शान्ता को आशा थी कि ऋष्यशृंग उसे अवश्य अपनी अर्द्धांगिनी बनाएंगे, परंतु राजकुमारी शान्ता के साथ उनके होने वाले विवाह की खबर ने उसकी आशाओं पर तुषारापात कर दिया. सावंती से अपनी पुत्री के हृदय कि व्यथा छुपी न रह सकी. वह उसे समझाती हुई बोली-

"देखो पुत्री, हम किसी ऋषि कुमार या राजकुमार को पति रूप में प्राप्त करने का स्वप्न भी नहीं देख सकती. क्योंकि हम समाज में निकृष्ट मानी जाती हैं. हम सिर्फ उनका मनोरंजन कर सकती हैं. उनकी अर्द्धांगिनी नहीं बन सकती. यह सौभाग्य किसी कुलीन घराने की कन्या अथवा किसी राजघराने की राजकुमारी को ही प्राप्त होते हैं. तुम ऋष्यशृंग को भूल जाओ."

"भूलने की बहुत चेष्टा करती हूँ माँ, परंतु भूल नहीं पाती." शान्ता के हृदय की वेदना उसके सुन्दर मुखड़े पर उभर आयी. अपनी पुत्री की वेदना को अनुभव कर सावंती का दिल भी तड़प उठा. 

"तुम्हें भूलना ही होगा पुत्री. इसी में तुम्हारी भलाई है."

सावंती ने कड़े स्वर में उसे आज्ञा देते, हुए कहा.

"ठीक है माँ, अब हृदय पर पाषाण रखकर भूल जाऊंगी उस कृतघ्न को, जिसने मेरे प्रेम को भूला दिया." शान्ता अपनी आँखों में उमड़ आये आंसुओं को पोंछती हुई दूसरे कक्ष की ओर भाग गयी. अपनी बेटी की वेदना ने सावंती के हृदय को भी झकझोर कर रख दिया. मगर वह सिवा उसे सांत्वना देने के और कर भी क्या सकती थी.? 

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ऋष्यशृंग और राजकुमारी शान्ता के विवाह की तैयारियां आरंभ हो गयी. महाराज दशरथ अपनी पत्नी तथा राजकुमारी शान्ता की जन्मदात्री महारानी कौशल्या के साथ चंपा नगरी में पधार चुके थे. प्रजा भी प्रसन्न थी. विवाह के दिन पूरी चंपा नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया. आनंद की इस बेला में महाराज की आज्ञा से नगर नर्तकियों ने भी अपने नृत्य-कला का प्रदर्शन किया. नगर विभूषणा शान्ता ने ऐसा मनमोहक नृत्य किया कि ऋष्यशृंग भावविभोर हो उठे. अब ऋष्यशृंग को स्मरण हुआ कि यह तो वही नर्तकी है, जिसने उसे स्त्री के अस्तित्व से परिचित करवाया था. "परंतु भार्या रूप में मेरे पार्श्व में बैठी यह शान्ता कौन है? ओह..... ओह.....यहाँ भी धोखा हो गया मेरे साथ." ऋष्यशृंग के हृदय में नर्तकी शान्ता के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ, परंतु तबतक काफी देर हो चुकी थी. ऋष्यशृंग और राजकुमारी शान्ता परिणय सूत्र में बंध चुके थे? और अब वे दोनों पतिपत्नी थे.

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(द्रष्टव्य : विभांडक पुत्र यही ऋष्यशृंग बाद में शृंगी ऋषि के नाम से विख्यात हुए और इनके द्वारा ही अयोध्या में कराए गए पुत्रेष्टि यज्ञ के द्वारा उनके श्वसुर यानि अयोध्या पति महाराज दशरथ को अपनी तीनों रानी कौशल्या कैकेयी तथा सुमित्रा के गर्भ से राम, भरत, शत्रुध्न तथा लक्षण जैसे आदर्शवादी और तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति हुई थी. बाद की भगवान श्रीराम की कथा (रामायण) से तो भारत का बच्चा बच्चा परिचित है.) 

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समाप्त!

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