पौराणिक पौराणिक कथा  


-रामबाबू नीरव

[पूर्व कथन : अयोध्या नरेश महाराज दशरथ तथा महारानी कौशल्या की शान्ता नाम की पुत्री थी. जब राजकुमारी शान्ता बाल्यावस्था में ही थी, तभी उसे अंग नरेश महाराज रोमपाद (लोमपाद), जो महाराज दशरथ के साढ़ू तथा परमप्रिय मित्र थे, ने अपने मित्र से उनकी पुत्री को गोद मांग लिया. महाराज रोमपाद की पत्नी वर्षिणी कौशल्या की छोटी बहन थी और वे नि:संतान थी, महारानी वर्षिणी भी राजकुमारी शान्ता को अपनी पुत्री बनाना चाहती थी. हालांकि उस समय महाराज दशरथ को संतान के रूप में एकमात्र शान्ता ही थी, (कुछ पुराणों में महारानी कौशल्या की दो पुत्रियों का जिक्र है. परंतु अधिकांश पुराणों में सिर्फ शान्ता का ही जिक्र हुआ है, अतः मैंने भी सिर्फ शान्ता को ही उनकी पुत्री माना है. शान्ता भगवान् श्री राम से बड़ी थी, यह कहानी जिस समय की है उस समय तक श्री राम तथा उनके अन्य भाइयों का जन्म नहीं हुआ था.) फिर भी वे अपने मित्र तथा साढ़ू की याचना को ठुकरा नहीं पाये और अपनी साली यानि महारानी वर्षिणी की गोद में अपनी प्रिय पुत्री शान्ता को डाल दिया. इस तरह राजकुमारी शान्ता अयोध्या के राजमहल से चंपा नगरी (अंगदेश की राजधानी) के महल में आ गयी. बाद में राजकुमारी शान्ता का विवाह विषम परिस्थितियों में महर्षि विभाण्डक तथा अप्सरा उर्वशी के संयोग से उत्पन्न पुत्र शृंगी ऋषि के साथ हुआ. इसी शृंगी ऋषि द्वारा अयोध्या के राजमहल में पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जाने पर महाराज दशरथ की तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी तथा सुमित्रा के गर्भ से श्रीराम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुध्न का जन्म हुआ था. आगे पढ़िए शृंगी ऋषि तथा शान्ता की कथा मेरी निज की भाषा और शैली में.]

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     अंगदेश (वर्तमान भागलपुर जिला) की राजधानी चम्पा नगरी के आसपास सघन वन था. उस काल में चम्पा नगरी से होकर महामती (सरस्वती) नदी बहा करती थी. (वर्तमान में भागलपुर गंगा नदी के तट पर स्थित है. हो सकता है उस समय चंपा नगरी से होकर बहने वाली नदी का नाम महामती अथवा सरस्वती रहा हो.) मनोरमा नदी के तट पर ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक ऋषि का आश्रम एक मनोरम एवं रमणीक स्थल पर था. वैसे तो विभाण्डक ऋषि अपने पिता महर्षि कश्यप की तरह ही तेजस्वी और प्रकाण्ड विद्वान थे फिर भी वे विशेष सिद्धियाँ प्राप्त करने हेतु परम पिता ब्रह्मा की घोर तपस्या में लीन हो गये. लगातार कई वर्षों तक वे तपस्या में लीन रहे.

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   उधर इन्द्रलोक में अनिंद्य सुन्दरी अप्सरा उर्वशी अपने अनुपम नृत्य कौशल से देवताओं को रिझा रही थी. सोमरस का पान करते हुए देवराज इन्द्र अन्य देवताओं के साथ उर्वशी के नृत्य पर झूम रहे थे. तभी अचाक देवराज का इन्द्रासन डोलने लगा. इन्द्र के साथ साथ सभी देवता घबरा गये और चकित भाव से एक दूसरे की ओर देखने लगे. ऐसा लगने लगा जैसे एकाएक वहाँ भयानक तूफान आ गया हो. उर्वशी का नृत्य थम गया. गंधर्वों ने वाद्ययंत्र बजाना रोक दिया. घबराहट के मारे वहाँ उपस्थित सभी देवताओं, गंधर्वों तथा अप्सराओं का मुख मंडप स्याह पड़ गया. सबसे अधिक घबराये हुए इन्द्र दिख रहे थे. तभी किसी चमत्कार की तरह "नारायण..... नारायण" कहते तथा सारंगी बजाते हुए वहाँ वामदेव देवर्षि नारद जी प्रकट हुए. नारद जी के ओठों पर मुस्कान थी. ऐसा लग रहा था जैसे वे देवराज इन्द्र का उपहास उड़ा रहे हों.

"देवर्षि नारद जी, यह क्या हो रहा है?" थोड़ा कुपित स्वर में देवराज ने पूछा. 

"हे देवराज इन्द्र, आप यहाँ अप्सराओं के नृत्य तथा सोमरस में डूबे हुए हैं और वहाँ भूलोक में महर्षि कश्यप के युवा पुत्र विभाण्डक ऋषि आप का इन्द्रासन हथियाने के लिए घोर तपस्या में लीन हैं. उनकी तेजस्विता से ही अभी आपका सिंहासन हिल रहा था."

"ओह....!" देवर्षि नारद की बातें सुनकर देवराज इन्द्र भय से कांपने लगे. पूर्व में भी राजर्षि विश्वामित्र ने भी इसी तरह की तपस्या में लीन होकर पूरे देवलोक 

को ही हिला दिया था. तब देवराज इन्द्र ने अप्सरा रम्भा को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भूलोक पर भेजा था, परंतु रंभा विश्वामित्र की क्रोधाग्नि की ज्वाला में जल कर भस्म हो गयी. बाद में इन्द्र ने मेनका को भेजा. मेनका विश्वामित्र जी की तपस्या भंग करने में सफल हो गयी. अब आज विभाण्डक ऋषि का तप भंग करने के लिए किस अप्सरा को भेजा जाए.? देवराज की दुश्चिंता बढ़ गयी. तभी उनकी दृष्टि नृत्य की मुद्रा में खड़ी उर्वशी पर पड़ी. उनके मुँह से मद्धिम सा स्वर निकल पड़ा -"तीनों लोको में विख्यात सर्वश्रेष्ठ नृत्यांगना उर्वशी तो मेरे समक्ष ही खड़ी है और मेरा मन व्यर्थ ही व्यग्र हो रहा है. उनकी आवाज वहाँ उपस्थित देवताओं, गंधर्वों के साथ साथ उर्वशी के कानों में भी पड़ी. देवराज इन्द्र के मुख से अपना नाम सुनकर उर्वशी चिहुँक पड़ी और मन ही मन वह कांप गयी. उसे अप्सरा रंभा की याद आ गयी, जो ऋषि विश्वामित्र की क्रोधाग्नि में जलकर राख हो गयी थी. 

"क्षमा करें देव." वह देवराज के समक्ष नतमस्तक होती हुई कंपित स्वर में बोली -"मैं आपकी बातों का आशय समझ नहीं पायी देव."

"तुम अभी भूलोक पर जाओ और वहाँ मनोरमा नदी के तट पर तपस्या कर रहे विभाण्डक ऋषि की तपस्या अपने सौंदर्य और नृत्य कौशल से उलझा कर भंग कर दो. यह मेरी आज्ञा है."

"परंतु क्षमा करें देव मैं रम्भा की तरह भस्म होना नहीं चाहती."

"उर्वशीऽऽऽऽ." चीख पड़े देवराज. "मेरी आज्ञा की अवहेलना करने का दुस्साहस किसी भी अप्सरा ने नहीं की..... फिर तुमने ऐसी धृष्टता कैसे की?" क्रोध से इन्द्र की भुजाएँ फड़कने लगी. उनके उस विराट रूप को देखकर बुरी तरह से घबरा गयी उर्वशी. सचमुच भावावेश में आकर? वह देवलोक के नियमोें तथा मर्यादा को भूल गयी थी. वह इन्द्रदेव की करबद्ध अभ्यर्थना करती हुई बोली-

"मेरी धृष्टता क्षमा करें देव, मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है. परंतु भूलोक पर मुझे अकेली....?"

"तुम चिंता मत करो उर्वशी,  कामदेव भी अपनी पत्नी रति के साथ भूलोक पर जाएंगें."

"तो ठीक है देव मैं आपकी आज्ञा के साथ स्वर्ग लोक के नियमों तथा मर्यादा का पालन पूरी निष्ठा के साथ करूँगी." उर्वशी इन्द्रदेव तथा सभी देवताओं को नमन कर वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गयी.

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   भूलोक में युवा ऋषि विभाण्डक अपनी सिद्धि पाने के लिए परमपिता ब्रह्माण्ड की कठिन तपस्या में लीन थे. उस सघन वन में अद्भुत शान्ति छायी हुई थी. हवा में उष्णता थी. जो पतझड़ के मौसम की अनुभूति करा रही थी. अचानक मलय पर्वत की ओर से चंदन की सुगंध लिए पवन का एक झोंका आया और पलक झपकते ही वहाँ बसंत ऋतु की मादकता छा गयी. यानि उस निर्जन वन में स्वर्गलोक से कामदेव के साथ उनकी सहचरी रति तथा अप्सरा उर्वशी का आगमन हो चुका था. पतझड़ के कारण ठूठ हो चुके पेड़ों पर हरियाली छा गयी. पेड़ों पर पक्षियों के जोड़े प्रेमभाव से ओतप्रोत होकर कलरव करने लगे. कोयल की "पी कहाँ.... पी कहाँ" की कूक गूंजने लगी. अन्य वन्यजीवों के युगल जोड़े भी प्रेमाभिनय में मग्न हो चुके थे. ऐसे मादक वातावरण में भला उर्वशी मौन कैसे रहती.? उसके पांव थिरकने लगे और शान्त वातावरण में घुंघरुओं की झनकार गूंजने लगी. साथ ही उर्वशी केजरीवाल ने कंठ से फूट पड़ी सुमधुर गीत की स्वर लहरी. गंधर्वों के मृदंग और वीणा बजने लगे. फिर तो ऐसा लगने लगा जैसे उस निर्जन वन में स्वर्ग उतर आया हो. उसी समय कामदेव ने अपने धनुष से ऋषि के वक्ष पर पुष्पवान से प्रहार कर दिया. फिर तो ऋषि की तपस्या भंग हो गयी. उनके शिथिल पड़ चुके शरीर में कामोत्तेजना का संचार होने लगा. यही वह समय था जब उर्वशी का नृत्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया और मलयानिल से बहते हुए सुगंधित पवन के झोंके से उसकी साड़ी उड़ कर विभाण्डक ऋषि के ऊपर जा गिरी. अब उर्वशी अर्द्ध नग्न अवस्था में उन्मुक्त भाव से नृत्य कर रही थी. ऋषि का सर्वांग रोमांचित हो उठा और उनका ब्रह्मचर्य उर्वशी के मनमोहक और मादक देहयेष्ठि के समक्ष पराभूत होने लगा. पुनः मलयानिल से हवा का तीव्र झोंका आया और इसबार विभाण्डक ऋषि स्वयं को संभाल नहीं पाये. उनकी समाधि टूट गयी और तपस्या भंग हो गयी. उन्होंने प्रज्वलित ऑंखों से उर्वशी की ओर देखा, परंतु उनकी ऑंखों में वह तेज न था, जो कभी विश्वामित्र की ऑंखों में था. कामदेव के पुष्पवान ने उनके ब्रह्मचर्य को नष्ट कर डाला था. उनकी कामोत्तेजना चरम पर पहुँच गयी, फिर तो पलक झपकते ही वह हो गया जिसकी विभाण्डक ऋषि ने कल्पना भी न की थी. अप्सरा उर्वशी उनसे अमरबेल की तरह लिपटी हुई थी और आकाश से उनके ऊपर पुष्पवर्षा हो रही थी.

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क्रमशः.......!

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