हर चीज़ बिकाऊ है यहाँ
हर चीज़ बिकाऊ है यहाँ, इंसाफ से लेकर इंसान तक। सपनों की भी कीमत लगी, अरमान से लेकर जान तक। सच्चाई अब नीलाम हुई, झूठ चढ़ा है सम्मान तक। ईमा...
हर चीज़ बिकाऊ है यहाँ
हर चीज़ बिकाऊ है यहाँ, इंसाफ से लेकर इंसान तक। सपनों की भी कीमत लगी, अरमान से लेकर जान तक। सच्चाई अब नीलाम हुई, झूठ चढ़ा है सम्मान तक। ईमा...
घर-घर में रावण
घर-घर में रावण हुए, चौराहे पर कंस । बहू-बेटियां झेलती, नित शैतानी दंश ।। मन के रावण दुष्ट का, होगा कब संहार । जलते पुतले पूछते, बात यही हर ब...
भारत वर्ष का हर्ष
तुम नमक नहीं, चंदन हो, वीर, हर चौके, छक्के में दिखा दिया धीर। देशभर में फैल गया अद्भुत हर्ष, सदा चमकते रहो हमारे भारत वर्ष। साहस तुम्हारा ...
है हिंदी यूं हीन (कविता)
बोल-तोल बदले सभी, बदली सबकी चाल। परभाषा से देश का, हाल हुआ बेहाल ।। जल में रहकर ज्यों सदा, प्यासी रहती मीन । होकर भाषा राज की, है हिंदी यूं...
हिंदी मेरे उर बसे (कविता)
आन-बान सब शान है, और हमारा गर्व। हिंदी से ही पर्व है, हिंदी सौरभ सर्व।। हिंदी हृदय गान है, मृदु गुणों की खान। आखर-आखर प्रेम है, शब्द- शब्द ह...
मनीषा की अरदास
मत रो माँ, अब मत रो, तेरी बेटी की आवाज़ हम सब हैं, न्याय की राह पर चल पड़े, अब जाग उठा हर जन-जन है…। गूँजे धरती, गगन गवाह, अन्याय के विरुद्ध...
रवि कुमार की दो कविताएं
1. तब कहीं जाकर शाम ढ़लती है हम तड़के से ही सुलगते सूरज को अपनी पीठ पर लादे पर्वतों को लांघते हैं समन्दरों को पाटते हैं और जब थककर चूर होकर ...
आजादी का जश्न तमाशा
खुद काजू की रोटी खाता जनता से चक्की पिसवाता भाषण में है भंग मिलाता देशराग में गाना गाता खुश अडानी , खुश है टाटा पब्लिक का है गीला आटा ढो...
ये ध्वज सुखदाई !
ये ध्वज सुखदायी मेरी जान, मेरा प्राण इसकी ओर मुझे खींचे इसकी आन, इसकी शान दूर कभी नहीं मेरे पास रहता है ये देखूँ मैं कहीं मेरे साथ चलता ह...
पत्थरों का सौदा
कितने ज़ख़्म लगे एक फल के लिए, ऐसे पत्थर नहीं फेंकना चाहिए। लाभ हो बूँद-सा, पर नुक़सान समंदर-सा, ऐसा सौदा नहीं करना चाहिए। जो दिलों की चाशनी...
रक्षाबंधन का सच
-डॉ सत्यवान सौरभ कलाई पर बँधा रेशमी धागा, कभी था जीवन का वादा, हर आँधी में साथ निभाने का, हर दर्द में सहारा बनने का। अब वह धागा कैमरे में ...
मैं बिंदी हूँ, मौन की ज्वाला
माथे पर चुप बैठी मैं, जैसे चाँदनी का एक बिंब – किंतु पूछते हो मुझसे, “तुम हो कौन, इस रंग में लिपटी?” मैं तो चुप थी वर्षों से, मौन की ज्वाला ...
मित्रता दिवस पर एक कविता
रूखे -मन को, सरस - स्नेह से - पग - पग सींचे, मित्र वही है। तप्त - हृदय को, नेह दिखाकर - दु:ख को भींचे, मित्र वही है। मित्र हो सच्चा, पक्...
इब्राहीम अश्क की गज़लें
(एक) सौ रंग तेरे मानी-ओ-मफ़हूम-ए-ख़यालां हर बार ही पाकीज़ा लगे जोश-ए-जमालां हर एक अदा तेरी क़यामत की अदा है शरमाये तेरे सामने दुनिया क...