(एक)
'अजीब मौज-ए-जुनूँ पर सवार हो गया था
फिर उस के बा'द मैं बे-इख़्तियार हो गया था
मिरे वुजूद में फिर इश्तिहार लगने लगे
कि दफ़'अतन कोई मुझ में फ़रार हो गया था
उस एक हुस्न की आमद हुई थी आँखों में
मिरा धड़कता हुआ दिल ग़ुबार हो गया था
निशाना मुझ पे लगा है फ़क़त मिरे दिल का
जहाँ के तीर से तो होशियार हो गया था
लगा था पहली नज़र में सभी को मैं मुबहम
दुबारा देखने पर आश्कार हो गया था
(दो)
करना है तो किसी दम ताज़ा तबी'अत कर जाए
कोई ख़ुशबू कहीं से आए सख़ावत कर जाए
वक़्त के हाथ को वो लम्हा मयस्सर ही नहीं
जो मिरे बिगड़े हुए दिल को नसीहत कर जाए
सिर्फ़ उम्मीद पे क़ाएम है यहाँ ये दुनिया
'ऐन मुमकिन है कि फिर कोई मोहब्बत कर जाए
मौत टल जाएगी कुछ देर ख़ुशी के मारे
मेरा बीमार अगर मेरी 'अयादत कर जाए
अब किसी ख़्वाब का क़ाइल नहीं हूँ मैं 'आज़र'
जो मिरी आँख में बैठा हो वो हिजरत कर जाए
(तीन)
अपनी मेहनत से बहुत लोग कमाए हुए हैं
ज़िंदगी हम तिरे मज़दूर हैं छाए हुए हैं
तेरी जानिब भी हमें फ़ासले तय करने पड़े
अपनी जानिब भी कहीं दूर से आए हुए हैं
शहर माँगेगा तो ता'बीर भी ला देंगे हम
ये नए ख़्वाब हमारे ही दिखाए हुए हैं
कैसी रुत थी कि वो तब भूल गए थे सब कुछ
कैसी रुत है कि हमीं ध्यान में लाए हुए हैं
इक ज़रा सा तो सफ़र है मगर इन लोगों ने
कैसे कैसे सर-ओ-सामान उठाए हुए हैं
(चार)
दर-ओ-दीवार पर सब्ज़ा नहीं है
वगरना और घर में क्या नहीं है
वफ़ा वाले कहाँ ग़ोता लगाएँ
त'अल्लुक़ कोई भी गहरा नहीं है
वो जिस मौसम में होता था नुमू मैं
किसी भी सम्त से लौटा नहीं है
'अजब गुम-गश्तगी में जी रहा हूँ
बदन तो है मगर चेहरा नहीं है
बहुत ही काम की है राएगानी
किसी ने ठीक से बरता नहीं है
(पांच)
अपनी अच्छी बुरी औक़ात जिए जाता हूँ
ख़ुद को जीना है सो हज़रात जिए जाता हूँ
दिन निकलता है तो दिन की ही तलब रहती है
रात होती है तो फिर रात जिए जाता हूँ
बीच का कुछ भी मुझे याद नहीं रहता है
आख़िरी पहली मुलाक़ात जिए जाता हूँ
वो बदन यूँ भी तलबगार नहीं है मेरा
वस्ल में हिज्र के लम्हात जिए जाता हूँ
मुझ को हर चीज़ में इम्कान नज़र आते हैं
रौशनी जब भी तिरे साथ जिए जाता हूँ
- बलवान सिंह आज़र
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