सरकार ने पारदर्शिता और न्याय की मंशा से ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी लागू की थी, लेकिन आज यह नीति शिक्षकों के लिए बोझ और असंतोष का कारण बन चुकी है।
हरियाणा की ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी, जो 2016 में शिक्षकों के लिए पारदर्शिता का प्रतीक बनकर आई थी, अब उनकी सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। वर्षों से ट्रांसफर लंबित हैं, ब्लॉक सिस्टम बाधा बन गया है और विद्यालयों में शिक्षकों का असंतुलन गहरा रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर विद्यार्थियों पर पड़ रहा है। सरकार को चाहिए कि समयबद्ध ट्रांसफर ड्राइव चलाए और पॉलिसी में सुधार करे, ताकि न तो शिक्षक परेशान हों और न ही छात्रों की शिक्षा प्रभावित हो।
हरियाणा सरकार ने वर्ष 2016 में शिक्षकों के लिए ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी लागू की थी। उस समय इसे शिक्षा जगत में बड़े सुधार के रूप में देखा गया। दशकों से यह आरोप लगता रहा कि तबादलों में राजनीतिक हस्तक्षेप, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार हावी रहते थे। कई शिक्षक मनचाही जगह सेवा करते थे जबकि अन्य दूरदराज़ और कठिन क्षेत्रों में वर्षों तक फंसे रहते थे। इस असमानता ने शिक्षा व्यवस्था को भी गहरा नुकसान पहुँचाया।
ऑनलाइन पॉलिसी ने शुरू में उम्मीद जगाई। कहा गया कि शिक्षक अपनी पसंद और प्राथमिकता ऑनलाइन दर्ज करेंगे और मेरिट के आधार पर तबादला होगा। इससे भेदभाव खत्म होगा और पारदर्शिता आएगी। परंतु नौ साल बाद यह योजना अब विवादों और असंतोष का दूसरा नाम बन चुकी है।
आश्वासन और हकीकत
हर साल नए शैक्षणिक सत्र से पहले आश्वासन दिया जाता है कि ट्रांसफर होंगे, लेकिन अक्सर यह प्रक्रिया अधूरी रह जाती है। इस साल भी अप्रैल में घोषणा की गई थी कि विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए ट्रांसफर सत्र शुरू होने से पहले कर दिए जाएंगे। मगर अगस्त बीत गया और शिक्षकों को निराशा हाथ लगी। जब-जब ऐसी घोषणाएँ अधूरी रह जाती हैं, तो शिक्षकों का मनोबल टूटता है और शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।
ब्लॉक सिस्टम की पेचीदगी
इस नीति की सबसे बड़ी खामी “ब्लॉक सिस्टम” है। सरकार का तर्क है कि इससे प्रशासनिक सुविधा मिलती है और शिक्षक नज़दीकी ब्लॉक में ही स्थानांतरित होते हैं। लेकिन व्यवहार में यह उल्टा साबित हुआ। कई बार एक ही ब्लॉक में किसी विद्यालय में शिक्षकों की भारी कमी होती है, वहीं कुछ विद्यालयों में जरूरत से ज्यादा स्टाफ मौजूद होता है। नीति की जटिलता के कारण समायोजन नहीं हो पाता और विद्यार्थी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।
कोएक उदाहरण समझिए—मान लीजिए एक ब्लॉक में गणित के शिक्षक की 15 सीटें हैं लेकिन वहां 20 शिक्षक तैनात हैं, जबकि उसी जिले के दूसरे ब्लॉक में 10 सीटें खाली पड़ी हैं। ब्लॉक सिस्टम के कारण अतिरिक्त शिक्षक चाहकर भी खाली स्कूलों में नहीं भेजे जा सकते। इसका सीधा नुकसान विद्यार्थियों को होता है।
शिक्षकों का दृष्टिकोण
शिक्षक केवल अपनी सुविधा के लिए तबादले नहीं मांगते। वे चाहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था सुचारु रूप से चले, ताकि उनकी मेहनत सार्थक हो सके। जब वर्षों तक ट्रांसफर लंबित रहते हैं, तो शिक्षक घर-परिवार से दूर रहकर मानसिक तनाव झेलते हैं। कई महिला शिक्षक छोटे बच्चों को छोड़कर दूरदराज़ स्थानों पर सेवाएँ दे रही हैं। ऐसे हालात में उनका मन पढ़ाई पर कितना केंद्रित रह पाता होगा, यह सोचना मुश्किल नहीं।
दूसरी ओर, कई शिक्षक लंबे समय से एक ही जगह टिके हुए हैं। इससे उन पर पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं। यह भी सच है कि लंबे समय तक एक ही विद्यालय में रहने वाले शिक्षक और प्रधानाध्यापक स्थानीय राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं और शिक्षा से ज्यादा निजी हितों में उलझ जाते हैं। इस असंतुलन को खत्म करना बेहद ज़रूरी है।
शिक्षा पर असर
जब किसी विद्यालय में वर्षों तक विज्ञान या गणित का शिक्षक नहीं होता, तो छात्र पीछे रह जाते हैं। बोर्ड परीक्षा परिणाम गिरते हैं और इसका दोष अक्सर छात्रों या अभिभावकों पर मढ़ दिया जाता है। लेकिन असली जिम्मेदार प्रणाली है, जो समय पर सही अध्यापक नहीं भेज पाती। शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) कहता है कि हर विद्यालय में सभी विषयों के शिक्षक होना अनिवार्य है, लेकिन ट्रांसफर पॉलिसी की कमजोरियों ने इस लक्ष्य को ध्वस्त कर दिया है।
संगठन की भूमिका
हरियाणा स्कूल लेक्चरर एसोसिएशन (हसला) लगातार इस मुद्दे को उठा रहा है। संगठन का कहना है कि सरकार को समयबद्ध ट्रांसफर ड्राइव शुरू करनी चाहिए। यदि कोई स्कूल खाली रह जाता है, तो जिला स्तर पर शिक्षा अधिकारियों को डिप्यूटेशन का अधिकार दिया जाए। यह सुझाव व्यवहारिक है, क्योंकि इससे तत्कालीन संकट टाला जा सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार इतनी इच्छाशक्ति दिखाएगी? कई बार लगता है कि ट्रांसफर पॉलिसी का उपयोग प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक दबाव बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। जब चाहा प्रक्रिया रोक दी जाती है और जब चाहा कुछ तबादले चुनिंदा लोगों के लिए खोल दिए जाते हैं। इससे शिक्षकों का विश्वास डगमगाता है।
डिजिटलाइजेशन बनाम ज़मीनी हकीकत
सरकार ने पॉलिसी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर डालकर इसे “ई-गवर्नेंस” की सफलता बताया। लेकिन केवल पोर्टल बना देने से समस्या हल नहीं होती। डिजिटल प्लेटफॉर्म तभी सफल होता है जब उसमें समयबद्धता और जवाबदेही हो। यदि हर साल प्रक्रिया अधूरी ही छोड़ दी जाए, तो ऑनलाइन सिस्टम भी महज़ दिखावा बनकर रह जाता है।
आज हाल यह है कि कई शिक्षक हर साल ऑनलाइन आवेदन करते हैं, फीस जमा करते हैं, दस्तावेज़ अपलोड करते हैं, लेकिन अंत में परिणाम “कोई ट्रांसफर नहीं” निकलता है। ऐसे में उनमें गुस्सा और हताशा स्वाभाविक है।
शिक्षा मंत्री और हकीकत
शिक्षा मंत्री बार-बार कहते हैं कि “जल्द ही ट्रांसफर होंगे” लेकिन नौकरशाही और नीति की जटिलता के कारण बात आगे नहीं बढ़ती। इस बीच, सत्र बीत जाता है और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा चर्चा में रहता है, लेकिन समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं होती।
समाधान क्या है?
1. ब्लॉक सिस्टम की समीक्षा – इसे या तो खत्म किया जाए या लचीला बनाया जाए, ताकि शिक्षक जरूरत वाले स्कूलों तक पहुँच सकें।
2. समयबद्ध ट्रांसफर ड्राइव – हर साल अप्रैल से पहले प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य किया जाए।
3. डिप्यूटेशन का अधिकार जिला स्तर पर – खाली स्कूलों को भरने के लिए अधिकारियों को अधिकार दिया जाए।
4. पारदर्शिता और जवाबदेही – यदि किसी शिक्षक का ट्रांसफर नहीं होता, तो स्पष्ट कारण बताए जाएं।
5. मानवीय दृष्टिकोण – महिला शिक्षकों, विकलांग शिक्षकों और कठिन क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए विशेष प्रावधान हों।
शिक्षा की आत्मा
समाज में शिक्षा सबसे पवित्र कार्य है। यदि शिक्षक ही असंतोष में रहेंगे, तो वे विद्यार्थियों तक सकारात्मक ऊर्जा कैसे पहुँचाएंगे? एक निराश और हताश शिक्षक बच्चों को वही भाव देगा जो उसके भीतर है। इसलिए शिक्षक की समस्याओं को केवल “ट्रांसफर की मांग” मानकर टालना सही नहीं। यह शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ को मज़बूत करने का सवाल है।
सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों को केवल “डाटा” न माने, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की आधारशिला समझे। शिक्षक का मनोबल तभी ऊँचा होगा जब उसे न्यायपूर्ण और पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी।
सुधार की ज़रूरत या असंतोष का अड्डा
ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी की समीक्षा करके उसमें आवश्यक सुधार करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब तक इस नीति में पारदर्शिता, समयबद्धता और मानवीय दृष्टिकोण नहीं जुड़ता, तब तक यह केवल कंप्यूटर स्क्रीन पर चमकती फाइलें भर रहेगी, जमीनी हकीकत में नहीं।
शिक्षकों की आवाज़ अनसुनी करना न सिर्फ उनके साथ अन्याय है, बल्कि विद्यार्थियों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। सरकार को तुरंत कदम उठाकर इस जंजाल को दूर करना चाहिए। तभी शिक्षा का स्तर सुधरेगा और शिक्षक अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभा पाएंगे।
✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ
(संपादकीय विश्लेषण)
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