मॉरिशस के पचासवें स्वतंत्रता दिवस (12 मार्च 2018) पर विशेष:  डॉ. रामदेव धुरंधर

विश्व प्रसिद्ध रचनाकार मॉर्क ट्वेन कभी मॉरिशस आए थे। उन्होंने इस देश को देखने पर कहा था ईश्वर ने पहले मॉरिशस को बनाया होगा इस के बाद इस की नकल में स्वर्ग का किया निर्माण होगा। यह एक लेखक का नज़रिया था और मैं इन शब्दों के साक्ष्य में गर्व अनुभव करता हूँ मॉरिशस मेरी जन्मभूमि है। परंतु इस उक्ति को मैं केवल अपने देश के लिए न मान कर पूरे विश्व के लिए मानता हूँ। 

भारत जाने पर मुझे ऐसे - ऐसे रोचक स्थान देखने को मिलते हैं कि मन में प्रश्न पैदा होना स्वाभाविक होता है यदि स्वर्ग होता होगा तो क्या इस से अधिक निराला होता होगा? ईटली, फ्रांस मैडागास्कार आदि सारे देशों की अपनी - अपनी विशेषताएँ होने के साथ सौन्दर्य की अनंत खुली ज़मीं, अनंत आसमाँ है। सिरिया जैसा देश जो आज तबाह हो रहा है उस के भी सौन्दर्य के दिन थे।

अफगानिस्तान को गौतम बुद्ध की कभी की प्रतिमा से जोड़ कर उस की कल्पना में जाएँ तो लगेगा वहाँ भी मानसरोवर होता था जिस में कमल खिलते थे। प्रकृति का अद्भुत रचनाकार तो एक ईश्वर ही है जो सौन्दर्य का स्वयं अनन्य उपासक है। उस ने अपनी अद्भुत कूची से सृष्टि की रचना की है और दुर्भावना स्वयं उस के लिए अपरिचित होती होगी। वह तो राक्षस वृत्ति की एक परंपरा बन गई जिस ने बस विनाश जाना और शायद तब भगवान भी उस से हार मानने के लिए विवश हो गया हो। आज राक्षस वृत्ति पूरी उठान पर है और उस से केवल प्राकृतिक सौन्दर्य को खतरा नहीं, वरन मानव प्राणी भी उस से बहुत आहत है। मनुष्य अपना घर बना ले, उस के साथ सुन्दर बगीचा लगा ले और अपने परिवार के साथ सुख से रहना चाहे, लेकिन राक्षस वृत्ति के लोगों को तो बस एक कटार चाहिए थोड़ा सा ज़हर उन्हें प्राप्त हो जाए, इतने से ही भले चंगे परिवार को वे विनाश के कगार पर ले जा खड़ा करें।

मॉरिशस निराला नहीं है कि उसे विनाश का खतरा न हो या राक्षस वृत्ति से उस का अपना कोई आतंक न हो। परंतु मॉरिशस के मधुर दिन अभी बीते नहीं हैं, भाईचारा अभी खत्म हुआ नहीं है, इसलिए अपने देश के गुण गान के लिए मेरी आत्मा से जैसे कोई खनक बार बार मेरे ओठों पर आ जाती है और मैं गुनगुना पड़ता हूँ मॉरिशस अभी रहने लायक तो है।

मॉरिशस बहु भाषी और बहु संस्कृति देश है। यह तो सर्व विदित है मॉरिशस कभी वीरान देश हुआ करता था जिसे कालांतर में जन जीवन का संयोग प्राप्त हुआ। पहले यहाँ गोरे आए, अफ्रीकी आए, लेकिन तब देश के लिए कोई खास गहना न होता था। गहना तो तब हुआ जब भारत के लोगों को ला कर यहाँ बसाया गया। भारतीय बहुत डरे सहमे यहाँ आए थे और आए तो यहाँ से लौट जाने के लिए बिलखन में भी पड़े। जीवन का जाला ही ऐसा था गोरों के खेतों में काम करो और स्वयं आधे अन्न पर अपनी साँसों के साथ तारतम्य बिठा कर जीने का प्रयास करो। अपने बहू बेटे और माँ बहन हों तो जीवन और दुरुह हो। एक बहुत बड़ी बाधा इस बात से भी आती थी भारत के अपने संस्कारों को अपनी इच्छा से तिलांजलि दे सको तो मार और शोषण से बच जाओगे। अन्यथा यह सब छीने जाने के बदले प्रतिकार में मुट्ठियाँ तानो तो अंगुली काटे जाने से शुरु हो कर तुम्हारे पूरे अस्तित्व को कुतर दिया जाएगा। उन भारतीयों ने कैसे सपना देख लिया होगा, कैसे मन में तराशने का साहस कर लिया होगा आज अंधेरे बियाबान में भटक लेते हैं कल हमारी सुबह तो आने ही वाली है।

संस्कृति और स्वयं की पहचान के उस चट्टानी साहस को वंदन। मॉरिशस में स्थापित होने की उन की लगन को नमन।

मैं इस वक्त उन लोगों की उसी सुबह में अपने को खड़ा पा रहा हूँ। सूरज मेरा अंधेरा दूर कर रहा है। मेरे मॉरिशस की धरती ने मेरे पाँवों के टिके रहने के लिए दो अंगुली ज़मीन का मुझे अभयदान दे रखा है। साँसों के लिए हवा है, प्सास बुझाने के लिए पानी है, रहने के लिए घर है। मेरी अपनी स्वतंत्रता है, बोलने के मेरे शब्द हैं। भारतीय यहाँ कैदी थे और बात यहाँ आ कर संपूर्ण होती है आज मैं उन की संतान आज़ाद हूँ।


बहु भाषी और बहु संस्कृति मॉरिशस को इस तरह से बनाया गया है और यह बनता गया है। मैंने कहा भारतीयों के आने से इस का गहना है तो इस में किसी प्रकार का झूठ नहीं है। भारत के विभिन्न प्रांतों से लोगों ने यहाँ आने पर वहाँ की जीवन पद्धति से ही जीना चाहा था। रामायण, हनुमान चालीसा, मंदिर, पूजा पाठ, पहनावा, सब भारत से यथावत आए और वही यहाँ उन के जीवन के आधार हुए। उन पर वह जो प्रहार होता वह शारीरिक मात्र न हो कर सांस्कृतिक भी था। संस्कृति से मेरा तात्पर्य ईसाइयत से है। पादरी भारतीय मन के लोगों के घर बाइबिल की प्रतियाँ छोड़ जाते थे। अंग्रेज़ी और फेंच में पढ़ न सकें तो वे भारतीय भाषाओं में ये प्रतियाँ मुहैया करवाते थे। इतनी घोर प्रवंचनाओं के चलते भी भारतीयों ने अपना मस्तक ऊँचा रखा और आज मॉरिशस में हम स्बाभिमान मानते हैं न के बराबर लोग ईसाइयत में दीक्षित हुए थे। उन दिनों जो बचा कर रखा गया था उसी का पुण्य हमें अपने देश की आजादी में वरण हुआ है।

आज 2018 में हमारे देश की आजादी के पचास साल पूरे हो रहे हैं। बहुत उबड़ - खाबड़ रास्तों से हो कर हम यहाँ पहुँचे हैं। भारत जब आज़ाद हुआ था हम ने उस की आज़ादी को अपनी आज़ादी से जोड़ कर देखा था। घर घर तिरंगे उड़ाए गए थे। यह खून और संस्कृति का रिश्ता था और भारत इस पर बहुत करीब से नज़र रखता था। जो भारत से था, जिस का समर्पण भारत से था कालांतर में भारत ने उसे भुलाया नहीं। हमें भारत से बहुत सहायता मिली है। यह मॉरिशस को ‘लघु भारत’ के अलंकरण से मढ़ जाने वाली निश्चित ही एक सहृदय पहल है। हमें अपने देश की अंग्रेज हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़नी थी और खेतों से ले कर देश की दो तिहाई से अधिक ज़मीन पर फ्रांसीसी मूल के लोगों की स्थापित प्रभु सत्ता से लोहा लेना था। आज़ादी का हमारा झंडा आकाश में फहरते ही अंग्रेज़ तो चले गए, बस अपनी अंग्रेज़ी का झंडा गाड़ गए। उधर फ्रांसीसी मूल के गोरे हुए जिन्होंने देश पर अपनी प्रभु सत्ता को यथावत बनाये रख लिया, लेकिन देश हमारा भी हुआ है। अब इस तरह से निचोड़ सामने आता है एक समझौते के तहत हम यहाँ जी रहे हैं और किसी को किसी से खतरा नहीं है। 

भारत के लोग यहाँ भारत को जान कर आते हैं तो उन्हें यहाँ भारत मिल ही जाता है। इसी तरह यूरोप के लोगों को मॉरिशस में अपनी छवि नज़र आ जाती है। बस हमारा सब से बड़ा तकाज़ा है अमन चैन का। राजनीति के दावेदार तो हमारे यहाँ अधिकाधिक भारत मूल के लोग ही होते हैं। परंतु दुख का एक जलजला यह ज़रूर होता है राजनीति के गलियारे में अपनों में ही बहुत फूट है। खैर, यह अलग मुद्दा है जिस पर बोलने के लिए मैं कभी और प्रयास कर लूँगा। अभी मुझे अपने देश को वंदन करना है, इस की प्रकृति, इस की माटी की सोंधी महक को अपनी सद्भावना का अर्घ्य समर्पित करना है। देश को गाने के लिए हर वक्त मन के तार झंकृत नहीं होते। मैं ऐसा मानता हूँ इन दो शब्दों का लेखन करते हुए मेरे भीतर भी मेरा देश जाग गया है। मेरा देश मुझ से बाहर है तो उसे दूर तक देख लूँ और वह मेरे भीतर है तो उसे संभाल कर रख लूँ, कहीं से उसे किसी प्रकार की खऱोंच न पड़े।
अपने देश के पचासवें स्वतंत्रता दिवस को मेरा श्रद्धा - सुमन।
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लेखक मॉरीशस के वरिष्ठ कथाकार हैं। इनका चर्चित उपन्यास ‘पथरीला सोना’ छः खंडों में प्रकाशित हुआ है,जिसमें जिसमें भारत से मॉरीशस आए अपने पूर्वजों की संघर्षमय जीवन-यात्रा का कारुणिक चित्रण किया है। उन्होंने ‘छोटी मछली बड़ी मछली’, ‘चेहरों का आदमी’, ‘बनते बिगड़ते रिश्ते’, ‘पूछो इस माटी से’ जैसे अन्य शानदार उपन्यास भी लिखे हैं। रामदेव ने “विष–मंथन”तथा “जन्म की एक भूल” जैसे दो कहानी संग्रह भी लिखे हैं। इसके अतिरिक्त उनके अनेक व्यंग्य संग्रह और लघु कथा संग्रह भी प्रकाशित हैं।

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