हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और मशहूर कवि केदारनाथ सिंह का सोमवार रात निधन हो गया। पेट में संक्रमण की शिकायत के बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में एक पुत्र और पांच पुत्रियां हैं। उनके निधन के बाद साहित्य जगत की हस्तियां और उनके प्रशंसक दुखी हैं। सोशल मीडिया पर लोग उनकी कविताएं, उनसे जुड़े अनुभव साझा कर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। कई राजनीतिक हस्तियों ने भी उनके निधन पर दु:ख जाहिर किया है।

केदारनाथ सिंह का जन्म नवंबर 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव में हुआ था। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 में हिन्दी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। उन्होंने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष पद पर भी सेवा दी थी। केदारनाथ सिंह चर्चित कविता संकलन ‘तीसरा सप्तक’ के सहयोगी कवियों में से एक थे। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं। केदारनाथ सिंह ने कविता पाठ के लिए दुनिया के अनेक देशों की यात्राएं की थी।

उनकी सबसे प्रमुख लंबी कविता 'बाघ' है। इसे मील का पत्थर कहा जाता है। उनकी खास बात ये थी कि वे जटिल विषयों पर भी बेहद सरल और आम भाषा में लिखा करते थे। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया, जिसमें भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार भी शामिल है।

कोर्स की किताबों के बहाने जीवन की किताब खोलते चलने वाले वे विरल शिक्षक रहे हैं. हिंदी की लोकभाषाओं के अलावा वे अन्य भाषाओं के साहित्य पर नजर रखते थे।उनकी आलोचनाओं में कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान, मेरे समय के शब्द, मेरे साक्षात्कार आदि शामिल है।

केदारनाथ की एक कविता 'जाना' इस प्रकार है- मैं जा रही हूँ – उसने कहा, जाओ – मैंने उत्तर दिया, यह जानते हुए कि जाना, हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

सिर्फ 4 पंक्तियों की यह कविता अपने-आप में गहरे अर्थ लिए हुए। साधारण अर्थों में यह लग रहा है कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को जाने को कह रहा है। पर यहां प्रेमिका का कोई साधारण जाना नहीं है बल्कि प्रेमी को पता है कि वो फिर से लौटकर नहीं आएगी। इसके बावजूद प्रेमी बहुत ही सहज तरीके से प्रेमिका को जाने की इजाजत दे देता है। यह पूरी प्रक्रिया प्रेमी के लिए खौफनाक भी है लेकिन फिर वह प्रेमिका को जाने को कह रहा है। यहां प्रेमिका द्वारा जाने की बात कहने से अधिक उस प्रेमी द्वारा प्रेमिका को इजाजत देना महत्वपूर्ण है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैसा समाज जहां हर कोई एक स्त्री को अपने पास रखना चाहता, उसे बंधन में रखना चाहता है और उसे किसी तरह की स्वतंत्रता नहीं है, वहां एक पुरुष उसे जाने को बहुत ही सहज भाव से कह रहा है।

जिस वक्त केदारनाथ सिंह ने लिखना शुरू किया था उस वक्त कविता में दो तरह की विचारधाराओं का प्रभाव था। एक विचारधारा में निजी दुख को ही सब कुछ मानकर रचना की जा रही थी तो दूसरी धारा में सामाजिक दुख को। केदारनाथ सिंह की पूरी रचना प्रक्रिया इन दोनों धाराओं के अतिवाद से मुक्त होने की प्रक्रिया है। उनके यहां व्यक्ति की पीड़ा समाज की पीड़ा है और समाज की पीड़ा व्यक्ति की।

जब प्रगतिशील आंदोलन शुरू हुआ था तो कहा गया कि कविता में ‘श्रम में सौंदर्य’ पर बात होनी चाहिए। श्रम के मूल में क्रिया है। केदारनाथ सिंह ने क्रियाओं के सौंदर्य को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। क्रियाओं के ऊपर केदारनाथ सिंह से पहले हिंदी में शायद ही किसी कवि ने कविता लिखी हो। केदारनाथ सिंह ने बढ़ई द्वारा लकड़ी चीरने, बोझा बांधने से लेकर धूप में कपड़े सुखने और नदी के बहने पर भी कविताएं लिखीं हैं । उनके यहां मनुष्य के श्रम का भी सौंदर्य है और प्रकृति के श्रम का भी. दरअसल केदाननाथ सिंह किसी भी तरह के अतिवादों से संचालित हुए बगैर ‘यकीन के कवि’ हैं. जिसे मनुष्य, समाज और प्रकृति के मौलिक गुणों में भरोसा है. यही भरोसा उनकी कविताओं को आज भी प्रासंगिक बनाए रखे हुए है।

केदार नाथ सिंह हिंदी कविता में नए बिंबों के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। बीएचयू से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी करने वाले सिंह ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले वह हिंदी के 10वें लेखक हैं। इसके अलावा उन्हें मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

केदारनाथ सिंह की एक कविता  - अंत महज एक मुहावरा है 

अंत में मित्रों, इतना ही कहूंगा कि अंत महज एक मुहावरा है
जिसे शब्द हमेशा अपने विस्फोट से उड़ा देते हैं और
बचा रहता है हर बार वही एक कच्चा-सा
आदिम मिट्टी जैसा ताजा आरंभ जहां से
हर चीज फिर से शुरू हो सकती है......

इन्हीं शब्दों के साथ-अलविदा केदारनाथ !
अपने प्रिय कवि को 
विनम्र श्रद्धांजलि..                                         

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