नई दिल्ली: यूनियन बजट 2018-19 को ब्रोकरेज फर्मों ने रूरल इकॉनमी के लिए पॉजिटिव बताया हैं। हालांकि इक्विटीज पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स के असर को लेकर उनकी राय बंटी हुई है।

एचएसबीसी के अनुसार CLSA का कहना है कि इन्वेस्टमेंट फ्लो घट सकता है। सरकार ने जीएसटी रेवेन्यू में 25 पर्सेंट बढ़ोतरी का टारगेट तय किया है जो हासिल होना मुश्किल लग रहा है। इक्विटीज पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स लगने से उनकी कॉस्ट बढ़ेगी और हो सकता है कि इससे इनफ्लो में कमी आए। 


HSBC: ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि फाइनैंशल ईयर 2019 के लिए 3.3 पर्सेंट का फिस्कल डेफिसिट टारगेट उम्मीद से थोड़ा ज्यादा है। साथ ही इक्विटी पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स लगने से ज्यादा नुकसान नहीं होगा। लॉन्ग टर्म में यह सबके लिए फायदेमंद होगा। रूरल इनकम में बढ़ोतरी ऐग्री केमिकल, क्रॉप प्रॉटेक्शन और एफएमसीजी कंपनियों के लिए शुभ संकेत है। 

क्रेडिट सुइस: ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि बाजार की उम्मीदों के उलट टैक्स अनुमान कंजर्वेटिव नजर आ रहा है। फिस्कल इयर 2019 का मंथली रन रेट फिस्कल इयर 2018 से ज्यादा होने की फिक्र करना सही नहीं है क्योंकि इस साल कलेक्शन घोषित मंथली रेट से ज्यादा रहा है। क्रेडिट सुइस के मुताबिक इक्विटीज पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स सेंटीमेंट के लिए नेगेटिव है। 

बीएनपी पारिबा सिक्यॉरिटीज (एशिया) : फाइनैंशल इयर 2018 के लिए 3.5 पर्सेंट और फिस्कल इयर 2019 के लिए 3.3 पर्सेंट का फिस्कल डेफिसिट बाजार की उम्मीदों से 10 बेसिस पॉइंट्स ज्यादा है। बीएनपी पारिबा के मुताबिक, यह बाजार के लिए निराशाजनक है लेकिन एकदम खराब नहीं है। ब्रोकरेज फर्म के मुताबिक उम्मीद से ज्यादा फिस्कल डेफिसिट होने का मतलब यह है कि बॉन्ड यील्ड और रियल इंट्रेस्ट रेट ज्यादा समय तक ऊंचे लेवल पर बना रह सकता है। 

बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच: कई ऐग्री कमोडिटीज के मिनिमम सपॉर्ट प्राइस में बढ़ोतरी हो सकती है लेकिन इससे महंगाई पर खास असर नहीं होगा क्योंकि ज्यादातर कमोडिटीज का दाम पहले से ही संभावित बढ़ोतरी से ऊंचे पर चल रहा है। एलटीसीजी टैक्स के चलते तीन साल के पीरियड में इक्विटी टैक्सेशन डेट से ज्यादा हो सकता है लेकिन सिर्फ इसी के चलते इक्विटी मार्केट में फंड फ्लो नहीं रुकेगा।

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